Sunday, 31 October 2010
Sunday, 14 June 2009
ADRAK

अदरक के चिकित्सकीय गुणों की जानकारी पुरातन चिकित्सा पद्धति में भी मिल जाएगी। खूबसूरती और सेहत के लिए फायदेमंद अदरक के गुणों पर डालते हैं एक नजर।
पेट की बीमारियों के लिए रामबाण: पेट दर्द समेत पाचन संबंधी कई समस्याओं के लिए अदरक रामबाण औषधि है। महिलाओं को माहवारी के वक्त होने वाले असहनीय दर्द से भी निजात दिलाता है। इसमें पेट को साफ करने के साथ ही कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करने, रक्त के थक्के जमने से रोकने, एंटी फंगल और कैंसर प्रतिरोधी गुण भी पाए जाते हैं।
मॉर्निग सिकनेस: ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं के अनुसार अदरक गर्भवती महिलाओं को होने वाली मार्निग सिकनेस (चक्कर आना, उल्टियां होना आदि) से भी निजात दिलाता है।
अपच: यदि आप बदहजमी की समस्या से जूझ रहे हैं तो रोज सुबह उठकर अदरक का एक छोटा टुकड़ा खाएं। नियमित रूप से ऐसा करने से आपको बदहजमी नहीं होगी।
सीने में जलन: सीने में जलन की शिकायत हो तो अदरक चबाना शुरू कर दें। इससे आपको आराम मिलेगा।
मोशन सिकनेस: जर्मनी के विशेषज्ञों के अनुसार अदरक सबसे अचूक असर वाली हर्बल औषधि है। लैनसेट में हुए एक शोध के अनुसार मोशन सिकनेस को रोकने में अदरक अन्य दवाओं से ज्यादा असरकारक है। इसके अलावा अदरक गले की खराश जैसी समस्या में भी राहत प्रदान करता है।
दर्द मिटाए चुटकी में..: अदरक की सबसे अहम खूबियों में इसे गिना जाता है। 'फूड्स दैट फाइट पेन' पुस्तक के लेखक ऑर्थर नील बर्नार्ड के मुताबिक अदरक में दर्द मिटाने के प्राकृतिक गुण पाए जाते हैं। यह बिना साइड इफेक्ट के किसी दर्दनिवारक दवा की तरह दर्द से निजात दिलाता है।
नैचुरल प्रिजरवेटिव: अदरक में प्राकृतिक रूप से किसी भी चीज को प्रिजर्व करने के गुण पाए जाते हैं। नाइजीरिया में हुए एक टेस्ट टयूब शोध के अनुसार अदरक का सत्व सालमोनेला नामक जीवाणु को खत्म करने में काफी असरकारक है। सालमोनेला किसी भी प्रिजर्व किए खाद्य पदार्थ को खराब कर देता है।
फैट कम करने में सहायक: अदरक का यह गुण निश्चित रूप से मोटापे के शिकार व्यक्तियों के लिए राहत देने वाला है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ओबेसिटी के अनुसार अदरक का सेवन कैलोरी को बर्न करने में मददगार है। हालांकि इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि अदरक कुछ हद तक ही फैट को बर्न करता है।
खूबसूरती बढ़ाए: अदरक त्वचा को ग्लो करने में मदद करता है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी स्किन हमेशा के लिए जवां बनी रहे तो सुबह उठकर खाली पेट एक ग्लास गुनगुने पानी के साथ अदरक का एक छोटा सा टुकड़ा खाएं।
अदरक को आप फल-सब्जी मानें या फिर विलक्षण दवा कह लें, यह गुणों की खान है। अधिकतर घरों में अदरक का उपयोग तरह-तरह से किया जाता है। भोजन के एक महत्वपूर्ण अंग और औषधि, दोनों रूपों में अदरक या सोंठ का प्रयोग किया जाता है। विशिष्ट गुणों से भरपूर अदरक का इस्तेमाल कई बड़ी-छोटी बीमारियों में भी किया जाता है। औषधि के रूप में इसका प्रयोग गठिया, र्यूमेटिक आर्थराइटिस (आमवात) साइटिका और गर्दन व रीढ़ की हड्डियों की बीमारी (सर्वाइकल स्पोंडिलाइटिस) होने पर किया जाता है। जोड़ों की इन बीमारियों के अतिरिक्त भूख न लगना, अमीबिक पेचिश, खाँसी, जुकाम, दमा और शरीर में दर्द के साथ बुखार, कब्ज होना, कान में दर्द, उल्टियाँ होना, मोच आना, उदर शूल और मासिक धर्म में अनियमितता होना इन सब रोगों में भी अदरक (सोंठ) को दवाई के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।ऐसे रोगियों के लिए अदरक का इस्तेमाल आप घर पर ही दवाई बना सकते है। * ताजे अदरक को पीसकर कप़ड़े में डाल लें और निचोड़कर रस निकालकर रोगी को पीने को दें। * अदरक का काढ़ा व चूर्ण बनाकर भी इस्तेमाल किया जाता है। * काढ़ा बनाने के लिए सूखे अदरक का चूर्ण बनाकर 15 ग्राम (लगभग तीन चाय के चम्मच) एक प्याला पानी में मिलाकर उबालें। जब पानी एक-चौथाई रह जाए तो इसे छानकर रोगी को पिला दें।* चूर्ण बनाने के लिए सौंठ की ऊपर की परत को छीलकर फेंक दें और शेष भाग को पीसकर चूर्ण बना लें। इसको यदि छान लिया जाए तो चूर्ण में रेशे अलग हो जाते हैं। उन्हें फेंक दें। यह चूर्ण शहद के साथ मिलाकर रोगी को खाने के लिए दिया जाता है।* लेप बनाते या पीसते समय अदरक के साथ थोड़ा पानी मिला लें। * ताजे अदरक को पीसकर दर्द वाले जोड़ों व पेशियों पर इसका लेप करके ऊपर से पट्टी बाँध दें। इससे उस जोड़ की सूजन व दर्द तथा माँसपेशियों का दर्द भी कम हो जाता है।
ND
ND
* लेप को यदि गर्म करके लगाया जाए तो इसका असर जल्दी होता है।* अगर किसी व्यक्ति को खाँसी के साथ कफ भी हो गया हो तो उसे रात को सोते समय दूध में अदरक डालकर उबालकर पिलाएँ। यह प्रक्रिया करीबन 15 दिनों तक अपनाएँ। इससे सीने में जमा कफ आसानी से बाहर निकल आएगा। इससे रोगी को खाँसी और कफ दोनों आराम भी महसूस होगा। रोगी को अदरक वाला दूध पिलाने के बाद पानी न पीने दें। * रोजमर्रा बनाई जाने वाली सब्जियों में अदरक का उपयोग अच्छा होता है। इससे शरीर के होने वाले वात रोगों से मुक्ति मिलती है।
रक विश्व औषधि के नाम से जानी जाती है। अदरक शक्ति और स्फूर्ति का भंडार माना जाता है। इसके उपयोग की जानकारी हो तो यह अनमोल है। अदरक के सूखने पर इसे सोंठ कहते हैं, ये दोनों ही रूप में हमारे लिये बलवर्धक है। यह जनाना तथा मर्दाना दोनों के लिये अत्याधिक उपयोगी है।सर्दी, जुकाम, खांसी, कफ, दमा में अदरक फायदा करता है। अदरक को जो किसी न किसी रूप में सेवन करता है वह हृदय रोग से दूर रहता है। शुगर तथा डायबिटीस को कंट्रोल करती है अदरक। अदरक, नींबू, सेंधा नमक हमें कैंसर से बचाता है। जुकाम से नाक बंद हो जाये, टॉन्सिल, बहरापन तथा कान बहने जैसे रोगों में अदरक का सेवन करें। इसी प्रकार अदरक तमाम परेशानी दूर करता है।अरूचि- यदाकदा भोजन के प्रति अरूचि पैदा हो जाती तो अदरक का रस और 1 चम्मच शहद मिलाकर दिन में तीन-चार बार चाटें।उंघना- पूरी नींद लेने के बाद भी काम के दौरान उंघना नींद आना जैसी परेशानी सताये तो सोंठ चूर्ण एक चुटकी चाय के खौलते पानी में डाल दें। तथा सर्दियों में धूप में बैठकर धीरे-धीरे पिये नींद भाग जायेगी। ये उंघना नींद शरीर में अम्लता के बढ़ जाने से होती है। यह हर समय नींद आना या उंघना जैसी एक बीमारी है। शारीरिक कमजोरी- अदरक एक घरेलू औषधि है। सोंठ इसका सूखा रूप है। आजकल अदरक अधिक से अधिक खाने पीने की चीजों में इस्तमाल किया जाता है। अदरक में बहुतायत में पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं जैसे प्रोटीन, खनिज, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, अदरक। अदरक शरीर को चुस्त व स्वस्थ बनाता है। साथ-साथ स्मरण शक्ति बढ़ाता है। अधिक सर्दी के दिनों में शरीर को उष्मा देता है, शक्ति बनकर रोगों का निवारण करता है। अदरक आंतो के लिये एक पाचक टॉनिक जैसा है। सोंठ को घी, गुड़ में मिलाकर खाने से नई चेतना व शक्ति मिलती है। वृद्धावस्था में अधिकतर लोगों की पाचन शक्ति मंद पड़ जाती है तो सोंठ का कवाथ लाभकारी होता है।हिचकी- ताजे अदरक का टुकड़ा मुंह में रखकर चूसने से हिचकी जाती रहेगी।मुंह में बदबू- अदरक का रस 1 चम्मच गर्म पानी में डालकर कुल्ला करें। मुंह की दुर्गंध जाती रहेगी।लकवा तथा हाथ पैर सुन्न होना1. उड़द की दाल पीसकर उसे घी में सेकें। इसमें गुड़, सोंठ पीसकर मिला दें। लड्डू बनाये। इसे नित्य सुबह शाम खायें। सोंठ पाउडर व उड़द की दाल उबालकर इसका पानी पीने से लकवा ठीक होता है। हाथ पैर सुन्न होने पर- एक गांठ लहसुन की तथा सोंठ पानी के साथ पीस लें जो अंग सुन्न हो रहा हो उस पर इसका लेप करें। तथा बासी मुंह दो कली लहसुन की व जरा सी सोंठ चबायें। यह प्रयोग कम से कम दस बारह दिन तक करें अवश्य आराम मिलेगा।कान का दर्द ठंडी हवा या कान में मैल जमने से या फिर फुंसी होने से कान में दर्द हो तो अदरक का रस कपड़े से छानकर, गुनगुना कर तीन-चार बूंद कान में डालेंतीन चार बार। यदि कान में सांय-सांय कर रहा हो तो थोड़ा-थोड़ा सोंठ, गुड़, घी मिलकर खाने से ठीक हो जायेगा।सावधानी-गर्मी के दिनों में अदरक का प्रयोग न करें। अगर जरूरी हो तो बहुत कम मात्रा में करें कारण इसकी तासीर गर्म होती है। रक्त की उल्टी में अदरक का प्रयोग बिल्कुल न करें।जोड़ों पर दर्द-अदरक को पीसकर जोड़ों पर लेप करें। दर्द ठीक होगा।ढाई सौ ग्राम तिल के तेल में 500 ग्राम अदरक का रस मिलाकर पकाऐं जब सिर्फ तेल रह जाये तो उसे ठंडा कर शीशी में भर लें फिर संधि शोध(जोड़ों के दर्द) पर लगाऐं मालिश करें आराम आयेगा।
ONION

प्याज : सामान्य परिचय
प्याज की अनेक किस्में उपलब्ध हैं और सभी का खास व्यंजनों में अलग-अलग महत्वपूर्ण योगदान है। यहां हम प्याज की कुछ खास किस्मों का वर्णन कर रहे हैं जो घर-घर में आसानी से उपलब्ध होती है।
सफेद प्याज
सफेद प्याज अनेक आकार-प्रकार जैसे गोल, अण्डाकार, बड़ी, छोटी, पिचकी आदि रूप में मिलता है। यह प्याज की सर्वश्रेष्ठ किस्म मानी जाती है। इसका अचार डाला जाता है। क्रीमी सॉस बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है। इसे कच्चा या पकाकर किसी भी प्रकार उपयोग में लाया जा सकता है।
लाल प्याज
यह आमतौर पर सभी बाजारों में बहुतायत मात्रा में मिलती है। कभी-कभी इसे इटैलियन प्याज भी कह दिया जाता है। इसके छिलके के नीचे की परतें हल्की-नीली-लाल रंग लिए होती है। इसको आमतौर पर सलाद बनाने में प्रयोग किया जाता है।
पीली प्याज
पीली प्याज मार्केट में आसानी से मिलने वाली किस्म है। इसका छिलका और परतें हल्का पीलापन लिए होता है। यह प्याज की सभी किस्मों में सबसे ज्यादा तीखी होती है, जो सलाद, सब्जी, अचार, चटनी आदि बनाने के काम में आती है।
पत्तेदार प्याज
हरी व ताजी उखाड़ी हुई प्याजों में जादुई स्वाद व गुण होते हैं। यह आलू सहित विभिन्न सब्जियों के साथ बनायी जाती है। सलाद, आमलेट व स्टीअर फ्राई रेसीपीज में भी इसका उपयोग होता है।अपेक्षाकृत कम तीखा होने के कारण प्याज न खाने वाले लोग भी इसका सेवन कर लाभ उठा सकते हैं। तल कर, पीसकर, उबालकर, सब्जियों के साथ मिलाकर कैसे भी खाएं-हरी प्याज आपको लाभ ही पहुंचाएगी।
प्याज में मौजूद विभिन्न तत्त्व व गुण
प्याज जीवनोपयोगी तत्त्वों की खान है। इसे गरीबों की ‘कस्तूरी’ कहा गया है। इसका उत्पादन गर्मी में ज्यादा होता है। यही कारण है कि गर्मी में लगने वाली ‘लू’ का इलाज भी यही प्याज है। प्याज में विटामिन सी, लोहा, गन्धक, तांबे जैसे उपयोगी खनिज पाए जाते हैं, जिनसे शारीरिक शक्ति बढ़ती है।प्रति 100 ग्राम प्याज में पाए जाने वाले पोषक तत्त्व निम्नानुसार हैं :प्रोटीन 1.2 ग्राम कार्बोहाइड्रेड 11.1 विटामिन A 15 मि.ग्रा.वसा 0.1 ग्राम कैल्शियम 46.9 मिग्रा. विटामिन C 11 मिग्रा.खनिज 0.4 ग्राम फॉस्फोरस 50 मि.ग्रा. कैलोरी 50 मि.कै.फाइबर 0.6 ग्राम लौह 0.7 मि.ग्रा. जल 86.6 ग्रामप्याज के डंठल में भी उपयुक्त सभी तत्वों का किसी न किसी अंश में समावेश होता है। डंठल में पानी की मात्रा अधिक रहती है। खनिज लवण और वसा का भी समावेश होता है। इसके बीजों में रंगहीन, गुणकारी व स्वच्छ तेल रहता है। जिसमें गंधक, एल्ब्यूमिन, चूर्णक व अम्ल आदि का समावेश होता है। यह तेल उड़नशील होता है और यही पदार्थ प्याज के सेवनकाल में श्वास के साथ जब शरीर से बाहर निकलता है तो मुंह से दुर्गन्ध आने लगती है।प्याज के तत्त्व रक्त में शीघ्र मिलकर उसके संचार को नियमित बना देते हैं। इसके सेवन से अपच दूर होता है और भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है। प्याज क्षय रोग के कीटाणुओं को नष्ट करता है। यह दंत रोग से बचाव करता है। इसके सेवन से पेशाब खुलकर आता है और उच्च रक्तचाप संयमित रहता है।शरीर की ऊर्जा शक्ति, उत्साह और जिगर की कार्य क्षमता बढ़ाने में प्याज बेजोड़ है। इसे औषधि के रूप में भी प्रयुक्त किया है। वातार्श, रक्ताल्पता और पीलिया में भी इसका सेवन लाभदायक देखा गया है।विशेषज्ञों के अध्ययन से निष्कर्ष निकलता है कि प्याज में कृमिनाशक गुण विद्यमान हैं। अत: इसके सामान्य सेवन से ही रोगोत्पादक कीटाणु नष्ट होते रहते हैं। प्याज का नियमित सेवन मनुष्य को दीर्घ और स्वस्थ जीवन प्रदान कर सकता है। पाचन की गड़बड़ी से पैदा होने वाले विकारों में भी प्याज रामबाण की भांति प्रभावकारी होता है। विभिन्न रोगों के चलते भूख मर जाने पर प्याज के सेवन से भोजन के प्रति पुन: रुचि जागृत हो जाती है। आंतों में उत्पन्न सड़न को भी प्याज जड़ से खत्म कर देता है।रक्त के थक्के जमने, रक्त प्रभाव में अवरोध आदि विकारों में भी नियमित प्याज का सेवन लाभकारी होता है। पक्षाघात, हृदय विकार व मस्तिष्क से सम्बन्धित रोगों पर भी प्याज का चमत्कारिक असर देखा गया है।मिर्गी, हिस्टीरिया और पाण्डुरोग में भी प्याज लाभकारी है। मिर्गी में प्याज को सुंघा देने मात्र से ही कई बार रोगी को चंगा होता देखा गया है।जुकाम, खांसी, फ्लू, यकृत, विकार, मूत्रावरोध या मूत्राल्पता तथा संधिवात आदि प्राकृतिक रोगों में प्याज का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा गया है। अनुसंधानकर्ता भी इस बात को प्रामाणिक मानते हैं।
दंत रोग
अनुसंधानों से यह स्पष्ट हो गया है कि दांतों की देखभाल या सुरक्षा के जो दावे किए जा रहे हैं वे सही नहीं है। दांतों मसूड़ों की ओर लोगों का रवैया अभी भी बदला नहीं है। दांतों-मसूड़ों के रोग बढ़े हैं। पुरानी जड़ी-बूटियों से बने टूथपेस्टों की ओर बाजार का रुख बढ़ रहा है।
दांत दर्द
दांत का दर्द बेहद असहनीय होता है, इससे सिर और आँखें भी प्रभावित होती हैं, आंखों से पानी गिरता है और सिर में दर्द होता है।उपचार- जैसे ही दांत में दर्द हो, फौरन प्याज की मदद से उसका इलाज कीजिए। कच्चे प्याज के टुकड़े दांतो के दर्द का समूल नाश करते हैं। एक टुकड़े को दुखते दांत पर रख लीजिए और धीरे-धीरे दबाव देकर चबाइए। दांतों का दर्द एक प्याज चबाते-चबाते खत्म हो जाएगा।
दांत में कीड़ा लगने पर
उपचार-दांतों में कीड़े लग जाने पर प्याज के रस से कुल्ला कीजिए और प्याज चबाइए फिर एक टुकड़ा प्याज कीड़े वाले दांतों के बीच दबाकर 15-20 मिनट तक बैठे रहें। ऐसा दिन में कई बार करें। कीड़े मर जाएंगे।
पायरिया
पायरिया दांत का भीषण रोग है। इसकी चपेट में आया एक दांत शीघ्र ही पूरी बत्तीसी को अपनी गिरफ्त में ले सकता है, अत: इसका उपचार फौरन शुरू कर देना चाहिए।उपचार-प्याज के टुकड़ों को तवे पर गर्म कीजिए और दांतों के नीचे दबाकर मुंह बंद कर लीजिए। इस प्रकार 10-12 मिनट में लार मुंह में इकट्ठी हो जाएगी। उसे मुह में चारों ओर घुमाइए फिर निकाल फेंकिए। दिन में 4-5 बार 8-10 दिन करें, पायरिया जड़से खत्म हो जाएगा, दांत के कीड़े भी मर जाएंगे और मसूड़ों को भी मजबूती प्राप्त होगी।
मसूड़े फूलना
उपचार-कलौंजी को दरककर प्याज के टुकडों में सानिए और मुंह में 10-15 मिनट रखिए। जब लार इकट्ठी हो जाए तो मुंह ढीला करके उसे बहने दें। इस प्रकार 3-4 बार करें, फौरन आराम पडे़गा।
मसूड़ों के विकार
मसूड़ों में मवाद पड़ जाए, सूज जाए, पिलपिले हो जाएं और उनमें दर्द होता हो तो दांत कमजोर पड़ जाते हैं। दांतों की मजबूती सुदृढ़ मसूड़ों पर ही निर्भर करती है, यदि नींव ही कमजोर पड़ जाए तो दांत की जड़ हिलती है और वे गिर जाते हैं अत: मसूड़ों को प्याज से दृढ़ता प्रदान कीजिए।उपचार- प्याज के टुकड़े मुंह में भर लें और मुंह बंद कर मसूड़ों पर फेंरे। कुछ ही देर में मुंह में लार जमा हो जाएगा। थोड़ी देर के बाद लार और टुकड़े थूक दें। यह क्रिया दिन में 4-5 बार दोहराएं और सुबह प्याज-रस मिले एक गिलास पानी के गरारे भी करें, गरारे धीरे-धीरे इस प्रकार करें कि मसूडों की अच्छी तरह सफाई हो सके।इस विधि से 6-7 दिनों में ही मसूड़ों को दृढ़ता मिलेगी और दांतों को जड़ जमाने के लिए मजबूत नींव।
पेट के रोग
‘पेट दुरुस्त, तो रहें तंदुरुस्त’ कहावत स्वास्थ्य का मूल मंत्र है। खाने-पीने में गड़बड़ी हो या फिर मानसिक तनाव, सभी का असर पाचन क्रिया पर पड़ता है। प्याज कैसे करता है उदर विकारों का नाश पढ़िए, इस अध्याय में।
अपच
खान-पान में अनियमितता तले, कच्चे-पक्के, गरिष्ठ पदार्थों के सेवन से प्राय: कब्ज हो जाता है जो लोग कुर्सी पर बैठने का कार्य करते हैं, व्यायाम से बचते हैं, उनको ये आम शिकायत रहती है। लगातार अनियमित खान-पान से अजीर्ण होने लगता है, साथ ही कब्ज सिरदर्द, एसिडिटी थकान, बेचैनी, गैस आदि आ घेरते हैं।उपचार- कुछ दिन प्याज का आधा प्याला रस पीजिए और खान-पान को नियमित बनाइए और अपच जैसे रोगों से कोसों दूर रहिए।
अतिसार
गंदे, बासी खाद्य पदार्थों व दूषित जल के सेवन से कभी-कभी दस्त लग जाते हैं। खाया-पिया अंग नहीं लगता, दस्त के रूप में बाहर निकल जाता है। बच्चों को भी सर्दी या गर्मी के कारण अतिसार हो जाता है। शरीर का पानी तेजी से घटने लगता है।उपचार- ऐसे में प्याज का दो चम्मच रस व एक चुटकी नमक दिन में चार बार सेवन करें और एक ही दिन में चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करें।
अफारा
कभी-कभी भोजन बड़ा स्वादिष्ट बनता है। दावत-शादी आदि मौकों पर बहुत से लोग मुफ्त का भोजन समझकर टूट पड़ते हैं-मानो पेट उनका न हो दुश्मनों का हो। ज्यादा खा लेने पर प्राय: पेट भारी हो जाता है। शाम का खाना सुबह तक नहीं पचता और लोग पुन: दबाकर भोजन कर लेते हैं-इस पर उनकी सांस फूलने लगती है।उपचार- प्याज, अदरक व लहसुन का एक-एक चम्मच रस एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर धीरे-धीरे चाटते हुए ग्रहण करना चाहिए। ऐसा पेट का अफारा समाप्त होने तक दिन में 2-3 बार किया जाना चाहिए।पथ्यापथ्य-जब पेट सामान्य हो जाए, उसके बाद ही हल्का व संतुलित भोजन लेना चाहिए।
अम्ल पित्त
ज्यादा चाय पीने, खाली पेट चाय-कॉफी लेने, तला-खट्टा-चटपटा भोजन ग्रहण करने से अम्ल पित्त की शिकायत होने लगती है। इससे सीने में तेज शूलयुक्त जलन होने लगती है, कभी-कभी यह दिल के पास होती है और तेज पसीना आने लगता है, रोगी छटपटाने लगता है।उपचार-एक बड़ा चम्मच सफेद प्याज का रस, दो बड़े चम्मच दही के साथ अच्छी तरह मिलाकर रोगी को दें।
आंव-दस्त
कई दिनों से कब्ज हो और उस पर दस्त लग जाए तो पेट में भीषण मरोड़ उठते हैं। शरीर दर्द से दोहरा हो जाता है और दस्त के साथ आव भी आता है। इससे बेहद कमजोरी महससू होती है। रोगी एक-दो दस्त में ही निढ़ाल-बेदम-सा हो जाता है। उपचार-ऐसे में एक बड़ा चम्मच प्याज का रस व दो बड़े चम्मच क्रीम रहित दही अच्छी तरह मिलाकर देना चाहिए। दिन में तीन-चार बार दें।1. खाने में मूंग की दाल की पतली घुटी हुई खिचड़ी दें। इस प्रयोग से दो-तीन दिन में ही इस रोग से मुक्ति मिल जाती है।
उल्टी
खाया-पिया भली-भांति न पचे तो वह मुंह के रास्ते उल्टी के रूप में बाहर निकल जाता है। अधिक शराब पीने, अरुचि अथवा जी मिचलाने से भी उल्टी की शिकायत हो सकती है।उपचार-एक छोटा चम्मच प्याज का रस व एक छोटा चम्मच अदरक का रस मिलाएं और रोगी को पिला दें। उल्टी आनी बन्द हो जाएगी।1. एक बड़ी चम्मच प्याज के रस में एक चुटकी नमक डालकर पिला दें। उल्टी की शिकायत खत्म हो जाएगी।
खट्टी डकारें
उपचार- खट्टी डकारें आने पर नीचे लिखे में से कोई भी एक नुस्खा आजमाएं:1. एक बड़ा चम्मच प्याज के रस में एक चुटकी नमक डालकर पी जाएं।2. प्याज का छिलका हटाकर उसे सेब की तरह खा जाइए।3. प्याज काटकर उस पर नीबू का रस छिड़कें और चबाकर खा जाएं।4. प्याज के स्लाइसों को कुछ देर सिरके में डुबाएं रखें और फिर चबा जाएं।
कब्ज
खान-पान की अनियमितता या किसी भी कारण से कब्ज हो सकता है। उपचार—प्याज काटें और नीबू निचोड़ लें। खाने के साथ सेवन करें।खाने के साथ खाली प्याज में हल्का-सा नमक बुरककर खाएं।सौ ग्राम प्याज में बीस ग्राम इमली के कोमल पत्ते मिलाएं और बारीक पीस लें। यह चटनी भोजन के साथ सेवन करें। कैसा भी कब्ज हो जड़ से खत्म हो जाएगा।
बवासीर
बवासीर खूनी व बादी दो प्रकार की होती है। इसमें निम्न प्रयोग आजमाएं :उपचार—बादी बवासीर में भोजन के साथ नियमित रूप से कच्ची प्याज का सेवन करना शुरू कर दें। कुछ ही दिनों में बवासीर खत्म हो जाएगा।प्याज को टुकड़े करके सुखा लें फिर गाय के घी में भूनकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को थोड़ी मिश्री व सफेद तिल के साथ नियमित रूप से सेवन करें। जल्दी ही रोग समाप्त हो जाएगा।बवासीर के मस्से हो गए हों तो उनमें कच्ची या पकी प्याज को पीसकर उसे मस्सों पर लगाएं। नियमित उपचार से शीघ्र आराम मिलता है।खूनी बवासीर में एक बड़े चम्मच प्याज के रस में आधा चम्मच चीनी व थोड़ा-सा घी मिलाएं और पी जाएं। निश्चित लाभ होगा।प्याज पर मिट्टी लगाकर गर्म राख में भूनें फिर साफ करके बारीक काटें। इसमें एक चम्मच पिसी मिश्री, चौथाई चम्मच पिसा सफेद जीरा और आधा चम्मच गाय का घी मिलाकर सेवन करें। खूनी बवासीर गायब हो जाएगी।
मदाग्नि
शरीर में कोष्ठबद्धता या लम्बी बीमारी से पेट की आग मन्द पड़ जाती है और सारा शरीर निस्तेज हो जाता है।उपचार—प्याज के रस में नीबू व अदरक का रस मिलाकर सेवन करने से भूख लगने लगती है। दिन में तीन खुराक कुछ दिन नियमित लें।
पेट में कीड़े
पेट में कीड़े पड़ने की शिकायत बच्चों में ज्यादा पाई जाती है। इससे पेट फूल जाता है, बच्चे को बार-बार भूख लगती है, पर खाया-पीया उसके शरीर को नहीं लगता, वह कमजोर हो जाता है।मिट्टी खाने से पेट में कीड़े होते हैं, इसके अलावा बिना धोए खाद्य पदार्थ, सड़ा-गला या ज्यादा मिठाई खाने से भी पेट में कीड़े पैदा हो हो जाते हैं।उपचार—25 ग्राम प्याज के रस में 15 ग्राम पानी मिलाकर बच्चे को नियमित रूप से दिन में सुबह-शाम दें। कुछ ही दिनों में मल के साथ कीड़े बाहर निकल जाएंगे।
Milk
दूध-घी
सामान्य परिचय
संस्कृत में दूध के तीन मूल नाम मुख्यतः प्रचलित हैं—दुग्ध, क्षीर और पय। ‘दुग्धं क्षीरे पूरिते च’, ‘क्षीरं पानीयदुग्ध यो:’, ‘पयः क्षीरे च नीरे च’—इन तीनों नामों की व्युत्पुत्तियां संस्कृत में बहुप्रचलित हैं। इनके अलावा दूध के हजारों नाम संसार की हर भाषा में प्रयोग में लाए जाते हैं। दक्षिण भारत की प्राचीन बोली में इसे ‘पाल’ कहा जाता है। यही नाम इसका तमिल में भी है। अंग्रेजी में इसे ‘मिल्क’ कहते हैं। दूध शब्द संस्कृत के ‘दुग्ध’ का अपभ्रंश रूप है।
धार्मिक महत्त्व
हिन्दू धर्मग्रन्थों में दूध के गुणों की अत्यधिक महिमा बखान की गई है। इसके अलावा बाइबिल, कुरान, अस्वेता इत्यादि प्राचीन ग्रंथ भी दूध देने वाले पशुओं के महत्व के गुण गान से भरे पड़े हैं। हिन्दुओं में गाय का सर्वोपरि महत्त्व उसके दूध के कारण ही है। यहूदी और ईसाइयों में भेड़ और बकरी के दूध का प्रचलन है। अरब जैसे रेगिस्तानी क्षेत्रों में ऊंटनी के दूध का उपयोग होता रहा है। भारत में गाय, भैंस, बकरी इत्यादि का दूध पुराने समय ही से उपयोगी माना जाता रहा है।हिन्दुओं के पूज्य और संसार के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में गाय की पूज्यता उसके दुग्ध के कारण ही है। पौराणिक ग्रंथों में कहा गया है—
गावो हि पूज्याः सततं सर्वेषां नात्र संशयः।
अर्थात् जो व्यक्ति स्वयं गाय का हनन करे या किसी अन्य से मरवाए, हरण करे या हरण करवाए, उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए।इसी प्रकार वेदों, पुराणों और अन्य धर्म शास्त्रों में भी गाय और उसके दूध का महत्व उसके गुणों के कारण विस्तारपूर्वक लिखा गया है।हिन्दुओं में गाय को अत्यंत पवित्र माना जाता है। पहले गोवध का प्रायश्चित मृत गाय की पूंछ लेकर एक वर्ष या तीन वर्ष इत्यादि समय तक भिक्षा मांगने पर पूर्ण होता था। आज भी गोवध को हिन्दुओं में अत्यंत घृणा से देखा जाता है। गाय को ‘माता’ का स्थान इसी कारण दिया गया है। क्योंकि माता ही ऐसी प्राणी है जो जीवन धारण करने के लिए दूध प्रदान करती है।पूजा की थाली में घी का दीपक जलाकर रखना, देव-पूजन, यज्ञ-हवन इत्यादि में शुद्ध घी का प्रयोग करना, धार्मिक कृत्यों में दूध और घी का उपयोग करना आदि बातें इस बात की परिचायक हैं कि दूध और घी का महत्व मानव जीवन में सर्वोपरि है।हिन्दुओं में शिवमूर्ति पर दूध चढ़ाना दूध की इसी महत्ता का परिचायक है जैन लोग भी अपनी देवमूर्तियों को दूध से ही स्नान कराते हैं। दूध से स्नान कराना पवित्रता और श्रेष्ठतम वस्तु की भावना प्रकट करता है।घरों में गाय पालना एक पवित्र धर्म माना जाता है जो भारत में दूध-घी के सर्वोत्कृष्ट गुणों के कारण ही है। ऋषी-मुनिगण भी सदैव अपने आश्रमों में गाय पालते थे। गाय को सभी तीर्थों का वास माना गया है। शास्त्रों में तो यहाँ तक प्रतिपादित है कि गाय के शरीर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित समस्त सैंतीस करोड़ देवता निवास करते हैं।दूध में पाए जाने वाले अनुपम गुणों के कारण ही इसे समस्त पदार्थों में सर्वोत्तम माना गया है। यह सबसे अच्छा और सुपाच्य पदार्थ है विभिन्न साग-सब्जियों एवं अन्य खाद्य पदार्थों को पचाने में शरीर की जितनी ऊर्जा व्यय होती है, उससे आधी भी दूध को पचाने में व्यय नहीं करनी पड़ती। वास्तव में यह पचा-पचाया रस है जो अतिशीघ्र शारीरिक अवयवों में परिवर्तित हो जाता है। इसे न काटने की, न चबाने की जरूरत है और न ही इसके लिए आंतों को पचाने में कोई श्रम करना पड़ता है। इसे शरीर की समस्त धातुओं में वृद्धि करने वाला ‘मधुर रस’ कहा गया है।दूध की इन्हीं विशेषताओं ने भारत में गाय को सर्वश्रेष्छ पशु का महत्व प्रदान किया है। यहां तक कि गाय को ‘गोमाता’ कहकर उसका सदैव सम्मान किया जाता है। उसे पौराणिक नाम ‘कामधेनु’ देने का अर्थ भी यही है कि ‘गाय’ ही एक मात्र पशु है जिसके संवर्द्धन से समस्त इच्छाएं पूर्ण की जा सकती हैं।
दूध के अनमोल गुण
दूध अनमोल गुणों का खजाना है। प्राचीन भारतीय ऋषियों का आयुर्वेदिक मंत्र और आशीर्वचन ‘जीवेम् शरदः शतम्’ दूध की शक्ति पर ही आधारित रहा है। दूध शरीर को मात्र शक्ति ही प्रदान नहीं करता, अपितु पुष्टि भी देता है। इसके सेवन से शरीर के समस्त धातुओं में वृद्धि होती है। दूध मनुष्य को ओज और तेज प्रदान करने का अनुपम साधन है।आयुर्वेद में दूध को ‘सवौषधीरसार’ अर्थात् समस्त औषधियों का सत्व कहा गया है। इसे समस्त रोगों की औषधि बताया गया है। यह ‘आयुवर्द्धक’ अर्थात् आयु बढ़ाने वाला, ‘अक्षि-ज्योति’ अर्थात् आंखों की रोशनी बढ़ाने वाला ‘मेध्य अर्थात् मस्तिष्क की मेधा शक्ति में वृद्धि करने वाला, ‘हृद्य’ अर्थात् हृदय को बल प्रदान करने वाला, ‘देव्य’ अर्थात् देवयज्ञों में उपयोग होने वाला ‘अनिन्द्य’ अर्थात् कभी भी निन्दा के योग्य न माना जाने वाला, ‘वीर्यवान’ अर्थात् वीर्य में वृद्धि करने वाला ‘बल्य’ अर्थात् बल प्रदान करने वाला, सेव्य’ अर्थात् सेवन करने योग्य और ‘रसायन एवं रसोत्तम’ अर्थात् समस्त रसों में श्रेष्ठ रस तथा विभिन्न रसों का सार माना गया है।आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार भी दूध सर्वोत्तम पेय पदार्थ है जिसे ‘संपूर्ण खाद्य’ माना जाता है। इसमें 85 प्रतिशत प्रोटीन होता है। कैल्शियम, पोटैशियम, आयोडीन, फॉस्फोरस, आयरन इत्यादि खनिज लवण और ‘ए’ विटामिन ‘सी’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘एच’, विटामिन ‘बी’ जैसे अनेक विटामिन भी इसमें पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं। इससे प्राप्त वसा अर्थात् ‘फैट’ भी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है जो अत्यंत सुपाच्य और हल्की होती है। इसी प्रकार दूध एक ऐसा पदार्थ है जिसके सहारे मनुष्य अन्य खाद्य इत्यादि ग्रहण किए बिना भी संपूर्ण स्वस्थ जीवन बिता सकता है।
जीर्ण ज्वरे मनोरोगे शोध-मूर्च्छाभ्रमेषुच, हितं एतद् उदाहृतम।
आयुर्वेद के इस श्लोक का अर्थ है कि पुराने से पुराना ज्वर, मानसिक बीमारियों, सूजन, बेहोशी और भ्रम अर्थात् मस्तिष्क विकारों को दूर करने में गाय का दूध-घी सर्वोत्तम हितकर है।दूध-घी ‘आयुष्य’ अर्थात् आयु बढ़ाने वाला, ‘वृष्य’ अर्थात् पौरुष में वृद्धि करने वाला तथा ‘वयः स्थापन्द’ अर्थात् वय को सुस्थिर करने वाला है।
श्रमे क्लमे हितम् एतद्।
भाव प्रकाश निघण्टु के इस वाक्य से स्पष्ट है कि दूध श्रम और थकान का नाश करने वाला है।
घी के गुण
दूध प्रत्येक आयु वर्ग को पौष्टिकता प्रदान करता है। यह सारे संसार में प्रयुक्त होने वाला प्रिय पदार्थ है। इसके साथ-साथ दूध अपने हर रूप में उपयोगी है। इससे अन्य उत्पाद भी तैयार किये जाते हैं। जैसे—घी, पनीर, मावा, दही, छाछ (मट्ठा), क्रीम, मक्खन इत्यादि। दूध इसी व्यापक आवश्यकता के कारण इसका व्यवसाय विश्व में सर्वाधिक है।
घी क्या है ?
घी दूध से प्राप्त होने वाला अद्भुत रसायन है जो प्राचीन भारत के बुद्धिमान और मनीषी ऋषियों की देन है। यूरोप और पश्चिमी देशों में अंग्रेज जाति के पूर्वज दूध से केवल मक्खन बनाने की कला ही जानते थे जबकि भारत में इससे अधिक सूक्ष्म और पौष्टिक पदार्थ घी का आविष्कार किया गया। घी वस्तुतः दूध में निहित वसा और विटामिनों का मिश्रण है।
दूध में कितना घी
प्राचीन आयुर्वेद शास्त्रों के अनुसार, गाय के एक द्रोण दूध में से एक प्रस्थ घी निकलना चाहिए अर्थात् एक सेर दूध में से एक छटांक घी निकलता है जबकि भैंस के एक द्रोण शुद्ध दूध में पांच भाग घी अधिक निकलता है अर्थात् एक सेर दूध में एक छटांक और पांचवा भाग (लगभग 70 ग्राम) घी निकलेगा। भेड़ तथा बकरी के एक सेर दूध में डेढ़ छटांक (लगभग 90 ग्राम) घी निकलेगा। किसी भी दूध को मथकर उसमें से निकलने वाले घी की मात्रा से दूध की शुद्धता की जांच आसानी से की जा सकती है।
घी के गुण
घी दूध का पौष्टिक और ठोस रूप है। इसमें दूध की तुलना में सूक्ष्म और भारी—दोनों गुण होते हैं। गाय के दूध की भांति गाय का घी भी आयुर्वेद में अमृत का रूप माना गया है, क्योंकि यह दूध का ही सत्व होता है। घी के गुणों को अनिर्वचनीय माना गया है। इसी कारण प्रत्येक यज्ञ में, संस्कार में अथवा प्रातः—सायंकालीन हवन में घी की आहुति दी जाती है। पूजा में घी का दीपक ही शुभ होता है। घी वातावरण में शुद्धि उत्पन्न करता है। यह पर्यावरण का महान रक्षक है। आयुर्वेद के अनुसार गाय का घी किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव नष्ट करने में सक्षम है। यह अनेक औषधियों का आधार है जिसमें विलीन होकर ही वे अपना प्रभाव दिखाती हैं। वास्तव में घी, वीर्य, पुष्टि और शक्ति का आद्भुत स्रोत है।
सिर के रोग
इन रोगों में मुख्यतः माइग्रेन (आधासीसी दर्द), अनिंद्रा (नींद न आना), सिर दर्द, स्नायु-दौर्बल्य, उन्माद भ्रम आदि रोग भी शामिल हैं। यह सभी रोग कमजोर मस्तिष्क के लोगों को अधिक होते हैं।
माइग्रेन (आधासीसी दर्द)
सिर के आधे भाग में रक्त-संचार में रुकावट हो जाना इस रोग का मुख्य कारण है। स्त्रियों को यह रोग अधिक घेरता है जो उनके मासिक—चक्र, गर्भावस्था इत्यादि के कारण होता है। दिमागी काम की अधिकता, मानसिक चिन्ताएं और तनाव, वायु प्रकोप, प्रदूषणजन्य वातावरण में काम करना इत्यादि इस रोग के अन्य कारण हैं। इसमें सूर्योदय होने के साथ ही सिर के आधे भाग में दर्द शुरू हो जाता है। यद दर्द सूर्यास्त तक बना रहता है। कभी-कभी अत्यंत तीव्र दर्द होता है। सर्दी लगना, चक्कर आना, मन्दाग्नि हो जाना, उल्टी होना अथवा प्रकाश की असहनीयता जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
उपचार—
250 मि.ली. गाय के दूध में 250 मि.ली. पानी मिलाएं। अब 5 लौंग, 5 टुकड़े दालचीनी और 2 टुकड़े पिप्पली-तीनों को पीसकर दूध-पानी में मिलाकर गुनगुना ही घूंट-घूंट करके सेवन करें और कंबल लपेटकर सो जाएं। सुबह–शाम दो बार यह प्रयोग कुछ दिन तक करें।
सिर दर्द
सिर दर्द होने के विभिन्न कारण हो सकते हैं। बुखार, सर्दी, वात रोग, अत्यधिक गरमी, नेत्र क्षीणता, मधुमेह आदि सिर दर्द के प्रधान कारण हैं। भूख के कारण भी सिर में दर्द होता है। व्यक्ति को किसी वस्तु विशेष जैसे बीड़ी-सिगरेट-तम्बाकू, चाय—कॉफी—मदिरा इत्यादि की लत होने पर उस वस्तु के न मिलने से भी सिर में दर्द हो जाता है।इसके अलावा कार्य की अधिकता या एक ही काम को निरंतर कई घंटे तक करते रहने पर भी सिर दर्द हो सकता है। अत्यधिक चिंता, किसी विषय पर लगातार सोचना, मानसिक आवेग इत्यादि कारणों से सिर में दर्द होने लगता है।सिर का दर्द हल्का या तेज हो सकता है। तेज सिर दर्द में सिर फटने-सा लगता है। माथे में तीव्र गरमी, पसीना, सुइयां चुभने जैसा अनुभव इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं। बेचैनी महसूस होती है। सब काम—धाम छोड़कर भाग जाने की इच्छा होती है।
उपचार—
गाय का शुद्ध घी माथे, कनपटियों तथा पैर के तलवों पर लेप कर मालिश करें। सर्दियों में घी गुनगुना कर लें। सिर दर्द में आराम आ जाएगा।गाय के गरम दूध के साथ चुटकी भर फिटकरी भस्म और चुटकी भर सोना गेरू पीस कर सेवन करें। सिर का दर्द दूर हो जाएगा।
स्नायु-दौर्बल्य
अत्यधिक चिंता, अत्यदिक परिश्रम, किसी लंबी बीमारी अथवा अत्यधिक मैथुन—कर्म इत्यादि कारणों से स्नायु—दौर्बल्य का रोग हो जाता है। वायु और कब्ज की उपेक्षा से भी इस रोग का जन्म हो सकता है।जल्दी थकान का अनुभव होना, शारीरिक कमजोरी, मानसिक शिथिलता (नर्वस) अनुभव करना इत्यादि की शिकायत हो जाती है। सिर में दर्द, सिर में चक्कर, स्फूर्ति की कमी, अनिद्रा, बात-बात में उत्तेजना, भोजन में अरुचि, रक्ताल्पता, शारीरिक भार में ह्रास, हृदय की धड़कनों में वृद्धि हो जाना इत्यादि अन्य लक्षण भी स्नायु-दुर्बलता में दिखाई देते हैं।
उपचार—
मुर्गी का अण्डा उबालकर अण्डे की पीली जर्दी निकाल लें। फिर इसे दूध व चीनी के साथ नित्य प्रतिदिन सुबह सेवन करें।पिस्ता, बादाम और किशमिश—तीनों 15-15 नग लेकर खरल में घोट लें। फिर उसे गुनगुने दूध के साथ सेवन करें।रोगी को अति श्रम से दूर रखें और मैथुन-कर्म वर्जित करें। सुबह-शाम स्वास्थ्यकारी वातावरण में टहलें। कब्ज या दस्त न होने दें। मानसिक आवेगों से बचें। इन उपायों से स्नायु-दौर्बल्य समाप्त हो जाता है।
उन्माद
अत्यधिक परिश्रम, अत्यधिक गरम और उत्तेजक आहार, मांस—मदिरा का अधिक सेवन, निरंतर मानसिक परेशानियां तथा मस्तिष्क में उद्वेग की अधिकता इत्यादि कारणों से उन्माद रोग उपजता है। शरीर में या सिर पर गहरी चोट लगने अथवा अत्यधिक गरमी के कारण भी उन्माद रोग हो सकता है। भारी नुकसान, प्रतिद्वंद्वी से हार जाने अथवा निराशा के कारण भी यह रोग हो जाता है। जन्मजात उन्माद रोग का उपचार संभव नहीं है, परंतु युवावस्था के पश्चात् होने वाले रोग अथवा अल्पकालीन रोग के रोगी उपचार द्वारा ठीक हो जाते हैं।अनिद्रा, अपच, स्मृति-नाश, बुद्धि-भ्रम, स्वेच्छा से बिना किसी तारतम्य की बातें कहना, आंखों की भाव-भंगिमा में परिवर्तन हो जाना, मानसिक भावनाओं को अधिक प्रकट करना, इच्छाओं पर काबू न रह जाना, तेज बोलना या अचानक चुप हो जाना इत्यादि लक्षण इस रोग में दिखाई देते हैं। रोगी आत्महत्या के विचार से भी ग्रस्त हो सकता है।
उपचार—
ब्राह्मी बूटी को गाय के घी में भली भांति पकाएं। ब्राह्मी बूटी न मिलने पर किसी प्रसिद्ध आयुर्वेदिक संस्थान का ‘ब्राह्मीघृत’ खरीद लाएं और एक गिलास गाय के दूध में 10 ग्राम यह घी डालकर एक उबाल दें। फिर इसे हल्का सा फेंटकर गुनगुना रह जाने पर 25 ग्राम शहद घोलकर घूंट-घूंट सेवन करें। एक माह के नियमित प्रयोग से यह रोग दूर हो जाएगा।सर्पगंधा तथा जटामांसी का चूर्ण 4-4 ग्राम लेकर 2 ग्राम शक्कर मिलाकर सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन करें।भोजन में धारोष्ण दूध, ताजे घी, कच्चे नारियल आदि की अधिकता रखें। मानसिक उत्तेजना से रोगी को बचाएं। भरपूर नींद लेने दें। हल्के-फुल्के कार्यों में ही रोगी को लगाएं। स्वच्छ और उत्फुल्ल प्राकृतिक वातावरण में सुबह-शाम भ्रमण करना काफी लाभदायक होता है।
मस्तिष्क-भ्रम
अत्यधिक मानसिक परिश्रम, मानसिक उद्वेग, चिंता, भय, शोक, निराशा जैसे भावों की अधिकता, लगातार एक ही कार्य करते रहना, आंखों पर अधिक जोर डालना, अंधेरे और तेज रोशनी वाले परिवर्तनीय कार्य इत्यादि कारणों से यह रोग हो जाता है।किसी काम में मन न लगना, चंचल रहना, हृदय की धड़कन बढ़ना, अनिद्रा, किसी वस्तु के कारण या लक्षण का भ्रम हो जाना, उत्तेजना, शोर या तेज रोशनी सहन न होना, भोजन से अरुचि इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं।
उपचार—
प्रतिदिन ब्राह्मीघृत लेकर चाटें और ऊपर से गाय का दूध का सेवन करें।नित्य प्रातः 5 खजूर खाकर एक गिलास गुनगुना गाय का दूध पिएं।गाय के दूध की मलाई व ब्राह्मी बूटी का ½ चम्मच रस एक चम्मच शहद मिलाकर एक माह तक नियमित रूप से सेवन करने से मस्तिष्क भ्रम का रोग दूर हो जाता है।
अनिद्रा (नींद न आना)
यह रोग प्रायः मानसिक कारणों से होता है। मानसिक परेशानियां, चिंताएं, शोक, तनाव, डर, निराशा आदि के कारण, अत्यधिक थकान होने के कारण, दिन में सोने, शारीरिक परिश्रम की कमी, अधिक भोजन, ध्वनि—प्रदूषण, उत्तेजक पदार्थों के अधिक सेवन इत्यादि कारणों से भी अनिद्रा रोग हो जाता है।नींद न आना इस रोग का प्रमुख लक्षण है। बेचैनी, सिर में लगातार भारीपन, कभी-कभी सिर दर्द होना, आंखों में जलन होना, शरीर में स्फूर्ति का ह्रास इत्यादि लक्षण भी दिखाई देते हैं।
उपचार—
एक गिलास गाय/भैंस का दूध देर तक पकाकर गुनगुना रहने पर रात को सोने से पूर्व पीएं। कुछ ही दिनों के नियमित प्रयोग से अनिद्रा रोग दूर हो जाएगा।बकरी का दूध उबालकर उसमें चुटकी भर नमक डालें। इस दूध से हाथों में कुहनियों तक हथेलियों पर तथा पैरों की पिंडलियों एवं तलुओं पर हल्की-हल्की मालिश करें। मालिश करने के पश्चात् गुनगुने पानी से दूध की चिपचिपाहट धो डालें। उसे धोने के लिए ठंडे पानी का प्रयोग करें। रोग दूर हो जाएगा।रात्रि को सोने से पूर्व मानसिक आवेगों—चिंता, निराशा, शोक, आशंका, भय इत्यादि से बचने का प्रयास करें। साथ ही सूर्यास्त के बाद तंबाकू, कॉफी, मदिरा आदि पदार्थों का सेवन न करें। हाथ-मुंह-पैर धोकर ही सोने के लिए लेटें।
सामान्य परिचय
संस्कृत में दूध के तीन मूल नाम मुख्यतः प्रचलित हैं—दुग्ध, क्षीर और पय। ‘दुग्धं क्षीरे पूरिते च’, ‘क्षीरं पानीयदुग्ध यो:’, ‘पयः क्षीरे च नीरे च’—इन तीनों नामों की व्युत्पुत्तियां संस्कृत में बहुप्रचलित हैं। इनके अलावा दूध के हजारों नाम संसार की हर भाषा में प्रयोग में लाए जाते हैं। दक्षिण भारत की प्राचीन बोली में इसे ‘पाल’ कहा जाता है। यही नाम इसका तमिल में भी है। अंग्रेजी में इसे ‘मिल्क’ कहते हैं। दूध शब्द संस्कृत के ‘दुग्ध’ का अपभ्रंश रूप है।
धार्मिक महत्त्व
हिन्दू धर्मग्रन्थों में दूध के गुणों की अत्यधिक महिमा बखान की गई है। इसके अलावा बाइबिल, कुरान, अस्वेता इत्यादि प्राचीन ग्रंथ भी दूध देने वाले पशुओं के महत्व के गुण गान से भरे पड़े हैं। हिन्दुओं में गाय का सर्वोपरि महत्त्व उसके दूध के कारण ही है। यहूदी और ईसाइयों में भेड़ और बकरी के दूध का प्रचलन है। अरब जैसे रेगिस्तानी क्षेत्रों में ऊंटनी के दूध का उपयोग होता रहा है। भारत में गाय, भैंस, बकरी इत्यादि का दूध पुराने समय ही से उपयोगी माना जाता रहा है।हिन्दुओं के पूज्य और संसार के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में गाय की पूज्यता उसके दुग्ध के कारण ही है। पौराणिक ग्रंथों में कहा गया है—
गावो हि पूज्याः सततं सर्वेषां नात्र संशयः।
अर्थात् जो व्यक्ति स्वयं गाय का हनन करे या किसी अन्य से मरवाए, हरण करे या हरण करवाए, उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए।इसी प्रकार वेदों, पुराणों और अन्य धर्म शास्त्रों में भी गाय और उसके दूध का महत्व उसके गुणों के कारण विस्तारपूर्वक लिखा गया है।हिन्दुओं में गाय को अत्यंत पवित्र माना जाता है। पहले गोवध का प्रायश्चित मृत गाय की पूंछ लेकर एक वर्ष या तीन वर्ष इत्यादि समय तक भिक्षा मांगने पर पूर्ण होता था। आज भी गोवध को हिन्दुओं में अत्यंत घृणा से देखा जाता है। गाय को ‘माता’ का स्थान इसी कारण दिया गया है। क्योंकि माता ही ऐसी प्राणी है जो जीवन धारण करने के लिए दूध प्रदान करती है।पूजा की थाली में घी का दीपक जलाकर रखना, देव-पूजन, यज्ञ-हवन इत्यादि में शुद्ध घी का प्रयोग करना, धार्मिक कृत्यों में दूध और घी का उपयोग करना आदि बातें इस बात की परिचायक हैं कि दूध और घी का महत्व मानव जीवन में सर्वोपरि है।हिन्दुओं में शिवमूर्ति पर दूध चढ़ाना दूध की इसी महत्ता का परिचायक है जैन लोग भी अपनी देवमूर्तियों को दूध से ही स्नान कराते हैं। दूध से स्नान कराना पवित्रता और श्रेष्ठतम वस्तु की भावना प्रकट करता है।घरों में गाय पालना एक पवित्र धर्म माना जाता है जो भारत में दूध-घी के सर्वोत्कृष्ट गुणों के कारण ही है। ऋषी-मुनिगण भी सदैव अपने आश्रमों में गाय पालते थे। गाय को सभी तीर्थों का वास माना गया है। शास्त्रों में तो यहाँ तक प्रतिपादित है कि गाय के शरीर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित समस्त सैंतीस करोड़ देवता निवास करते हैं।दूध में पाए जाने वाले अनुपम गुणों के कारण ही इसे समस्त पदार्थों में सर्वोत्तम माना गया है। यह सबसे अच्छा और सुपाच्य पदार्थ है विभिन्न साग-सब्जियों एवं अन्य खाद्य पदार्थों को पचाने में शरीर की जितनी ऊर्जा व्यय होती है, उससे आधी भी दूध को पचाने में व्यय नहीं करनी पड़ती। वास्तव में यह पचा-पचाया रस है जो अतिशीघ्र शारीरिक अवयवों में परिवर्तित हो जाता है। इसे न काटने की, न चबाने की जरूरत है और न ही इसके लिए आंतों को पचाने में कोई श्रम करना पड़ता है। इसे शरीर की समस्त धातुओं में वृद्धि करने वाला ‘मधुर रस’ कहा गया है।दूध की इन्हीं विशेषताओं ने भारत में गाय को सर्वश्रेष्छ पशु का महत्व प्रदान किया है। यहां तक कि गाय को ‘गोमाता’ कहकर उसका सदैव सम्मान किया जाता है। उसे पौराणिक नाम ‘कामधेनु’ देने का अर्थ भी यही है कि ‘गाय’ ही एक मात्र पशु है जिसके संवर्द्धन से समस्त इच्छाएं पूर्ण की जा सकती हैं।
दूध के अनमोल गुण
दूध अनमोल गुणों का खजाना है। प्राचीन भारतीय ऋषियों का आयुर्वेदिक मंत्र और आशीर्वचन ‘जीवेम् शरदः शतम्’ दूध की शक्ति पर ही आधारित रहा है। दूध शरीर को मात्र शक्ति ही प्रदान नहीं करता, अपितु पुष्टि भी देता है। इसके सेवन से शरीर के समस्त धातुओं में वृद्धि होती है। दूध मनुष्य को ओज और तेज प्रदान करने का अनुपम साधन है।आयुर्वेद में दूध को ‘सवौषधीरसार’ अर्थात् समस्त औषधियों का सत्व कहा गया है। इसे समस्त रोगों की औषधि बताया गया है। यह ‘आयुवर्द्धक’ अर्थात् आयु बढ़ाने वाला, ‘अक्षि-ज्योति’ अर्थात् आंखों की रोशनी बढ़ाने वाला ‘मेध्य अर्थात् मस्तिष्क की मेधा शक्ति में वृद्धि करने वाला, ‘हृद्य’ अर्थात् हृदय को बल प्रदान करने वाला, ‘देव्य’ अर्थात् देवयज्ञों में उपयोग होने वाला ‘अनिन्द्य’ अर्थात् कभी भी निन्दा के योग्य न माना जाने वाला, ‘वीर्यवान’ अर्थात् वीर्य में वृद्धि करने वाला ‘बल्य’ अर्थात् बल प्रदान करने वाला, सेव्य’ अर्थात् सेवन करने योग्य और ‘रसायन एवं रसोत्तम’ अर्थात् समस्त रसों में श्रेष्ठ रस तथा विभिन्न रसों का सार माना गया है।आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार भी दूध सर्वोत्तम पेय पदार्थ है जिसे ‘संपूर्ण खाद्य’ माना जाता है। इसमें 85 प्रतिशत प्रोटीन होता है। कैल्शियम, पोटैशियम, आयोडीन, फॉस्फोरस, आयरन इत्यादि खनिज लवण और ‘ए’ विटामिन ‘सी’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘एच’, विटामिन ‘बी’ जैसे अनेक विटामिन भी इसमें पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं। इससे प्राप्त वसा अर्थात् ‘फैट’ भी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है जो अत्यंत सुपाच्य और हल्की होती है। इसी प्रकार दूध एक ऐसा पदार्थ है जिसके सहारे मनुष्य अन्य खाद्य इत्यादि ग्रहण किए बिना भी संपूर्ण स्वस्थ जीवन बिता सकता है।
जीर्ण ज्वरे मनोरोगे शोध-मूर्च्छाभ्रमेषुच, हितं एतद् उदाहृतम।
आयुर्वेद के इस श्लोक का अर्थ है कि पुराने से पुराना ज्वर, मानसिक बीमारियों, सूजन, बेहोशी और भ्रम अर्थात् मस्तिष्क विकारों को दूर करने में गाय का दूध-घी सर्वोत्तम हितकर है।दूध-घी ‘आयुष्य’ अर्थात् आयु बढ़ाने वाला, ‘वृष्य’ अर्थात् पौरुष में वृद्धि करने वाला तथा ‘वयः स्थापन्द’ अर्थात् वय को सुस्थिर करने वाला है।
श्रमे क्लमे हितम् एतद्।
भाव प्रकाश निघण्टु के इस वाक्य से स्पष्ट है कि दूध श्रम और थकान का नाश करने वाला है।
घी के गुण
दूध प्रत्येक आयु वर्ग को पौष्टिकता प्रदान करता है। यह सारे संसार में प्रयुक्त होने वाला प्रिय पदार्थ है। इसके साथ-साथ दूध अपने हर रूप में उपयोगी है। इससे अन्य उत्पाद भी तैयार किये जाते हैं। जैसे—घी, पनीर, मावा, दही, छाछ (मट्ठा), क्रीम, मक्खन इत्यादि। दूध इसी व्यापक आवश्यकता के कारण इसका व्यवसाय विश्व में सर्वाधिक है।
घी क्या है ?
घी दूध से प्राप्त होने वाला अद्भुत रसायन है जो प्राचीन भारत के बुद्धिमान और मनीषी ऋषियों की देन है। यूरोप और पश्चिमी देशों में अंग्रेज जाति के पूर्वज दूध से केवल मक्खन बनाने की कला ही जानते थे जबकि भारत में इससे अधिक सूक्ष्म और पौष्टिक पदार्थ घी का आविष्कार किया गया। घी वस्तुतः दूध में निहित वसा और विटामिनों का मिश्रण है।
दूध में कितना घी
प्राचीन आयुर्वेद शास्त्रों के अनुसार, गाय के एक द्रोण दूध में से एक प्रस्थ घी निकलना चाहिए अर्थात् एक सेर दूध में से एक छटांक घी निकलता है जबकि भैंस के एक द्रोण शुद्ध दूध में पांच भाग घी अधिक निकलता है अर्थात् एक सेर दूध में एक छटांक और पांचवा भाग (लगभग 70 ग्राम) घी निकलेगा। भेड़ तथा बकरी के एक सेर दूध में डेढ़ छटांक (लगभग 90 ग्राम) घी निकलेगा। किसी भी दूध को मथकर उसमें से निकलने वाले घी की मात्रा से दूध की शुद्धता की जांच आसानी से की जा सकती है।
घी के गुण
घी दूध का पौष्टिक और ठोस रूप है। इसमें दूध की तुलना में सूक्ष्म और भारी—दोनों गुण होते हैं। गाय के दूध की भांति गाय का घी भी आयुर्वेद में अमृत का रूप माना गया है, क्योंकि यह दूध का ही सत्व होता है। घी के गुणों को अनिर्वचनीय माना गया है। इसी कारण प्रत्येक यज्ञ में, संस्कार में अथवा प्रातः—सायंकालीन हवन में घी की आहुति दी जाती है। पूजा में घी का दीपक ही शुभ होता है। घी वातावरण में शुद्धि उत्पन्न करता है। यह पर्यावरण का महान रक्षक है। आयुर्वेद के अनुसार गाय का घी किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव नष्ट करने में सक्षम है। यह अनेक औषधियों का आधार है जिसमें विलीन होकर ही वे अपना प्रभाव दिखाती हैं। वास्तव में घी, वीर्य, पुष्टि और शक्ति का आद्भुत स्रोत है।
सिर के रोग
इन रोगों में मुख्यतः माइग्रेन (आधासीसी दर्द), अनिंद्रा (नींद न आना), सिर दर्द, स्नायु-दौर्बल्य, उन्माद भ्रम आदि रोग भी शामिल हैं। यह सभी रोग कमजोर मस्तिष्क के लोगों को अधिक होते हैं।
माइग्रेन (आधासीसी दर्द)
सिर के आधे भाग में रक्त-संचार में रुकावट हो जाना इस रोग का मुख्य कारण है। स्त्रियों को यह रोग अधिक घेरता है जो उनके मासिक—चक्र, गर्भावस्था इत्यादि के कारण होता है। दिमागी काम की अधिकता, मानसिक चिन्ताएं और तनाव, वायु प्रकोप, प्रदूषणजन्य वातावरण में काम करना इत्यादि इस रोग के अन्य कारण हैं। इसमें सूर्योदय होने के साथ ही सिर के आधे भाग में दर्द शुरू हो जाता है। यद दर्द सूर्यास्त तक बना रहता है। कभी-कभी अत्यंत तीव्र दर्द होता है। सर्दी लगना, चक्कर आना, मन्दाग्नि हो जाना, उल्टी होना अथवा प्रकाश की असहनीयता जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
उपचार—
250 मि.ली. गाय के दूध में 250 मि.ली. पानी मिलाएं। अब 5 लौंग, 5 टुकड़े दालचीनी और 2 टुकड़े पिप्पली-तीनों को पीसकर दूध-पानी में मिलाकर गुनगुना ही घूंट-घूंट करके सेवन करें और कंबल लपेटकर सो जाएं। सुबह–शाम दो बार यह प्रयोग कुछ दिन तक करें।
सिर दर्द
सिर दर्द होने के विभिन्न कारण हो सकते हैं। बुखार, सर्दी, वात रोग, अत्यधिक गरमी, नेत्र क्षीणता, मधुमेह आदि सिर दर्द के प्रधान कारण हैं। भूख के कारण भी सिर में दर्द होता है। व्यक्ति को किसी वस्तु विशेष जैसे बीड़ी-सिगरेट-तम्बाकू, चाय—कॉफी—मदिरा इत्यादि की लत होने पर उस वस्तु के न मिलने से भी सिर में दर्द हो जाता है।इसके अलावा कार्य की अधिकता या एक ही काम को निरंतर कई घंटे तक करते रहने पर भी सिर दर्द हो सकता है। अत्यधिक चिंता, किसी विषय पर लगातार सोचना, मानसिक आवेग इत्यादि कारणों से सिर में दर्द होने लगता है।सिर का दर्द हल्का या तेज हो सकता है। तेज सिर दर्द में सिर फटने-सा लगता है। माथे में तीव्र गरमी, पसीना, सुइयां चुभने जैसा अनुभव इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं। बेचैनी महसूस होती है। सब काम—धाम छोड़कर भाग जाने की इच्छा होती है।
उपचार—
गाय का शुद्ध घी माथे, कनपटियों तथा पैर के तलवों पर लेप कर मालिश करें। सर्दियों में घी गुनगुना कर लें। सिर दर्द में आराम आ जाएगा।गाय के गरम दूध के साथ चुटकी भर फिटकरी भस्म और चुटकी भर सोना गेरू पीस कर सेवन करें। सिर का दर्द दूर हो जाएगा।
स्नायु-दौर्बल्य
अत्यधिक चिंता, अत्यदिक परिश्रम, किसी लंबी बीमारी अथवा अत्यधिक मैथुन—कर्म इत्यादि कारणों से स्नायु—दौर्बल्य का रोग हो जाता है। वायु और कब्ज की उपेक्षा से भी इस रोग का जन्म हो सकता है।जल्दी थकान का अनुभव होना, शारीरिक कमजोरी, मानसिक शिथिलता (नर्वस) अनुभव करना इत्यादि की शिकायत हो जाती है। सिर में दर्द, सिर में चक्कर, स्फूर्ति की कमी, अनिद्रा, बात-बात में उत्तेजना, भोजन में अरुचि, रक्ताल्पता, शारीरिक भार में ह्रास, हृदय की धड़कनों में वृद्धि हो जाना इत्यादि अन्य लक्षण भी स्नायु-दुर्बलता में दिखाई देते हैं।
उपचार—
मुर्गी का अण्डा उबालकर अण्डे की पीली जर्दी निकाल लें। फिर इसे दूध व चीनी के साथ नित्य प्रतिदिन सुबह सेवन करें।पिस्ता, बादाम और किशमिश—तीनों 15-15 नग लेकर खरल में घोट लें। फिर उसे गुनगुने दूध के साथ सेवन करें।रोगी को अति श्रम से दूर रखें और मैथुन-कर्म वर्जित करें। सुबह-शाम स्वास्थ्यकारी वातावरण में टहलें। कब्ज या दस्त न होने दें। मानसिक आवेगों से बचें। इन उपायों से स्नायु-दौर्बल्य समाप्त हो जाता है।
उन्माद
अत्यधिक परिश्रम, अत्यधिक गरम और उत्तेजक आहार, मांस—मदिरा का अधिक सेवन, निरंतर मानसिक परेशानियां तथा मस्तिष्क में उद्वेग की अधिकता इत्यादि कारणों से उन्माद रोग उपजता है। शरीर में या सिर पर गहरी चोट लगने अथवा अत्यधिक गरमी के कारण भी उन्माद रोग हो सकता है। भारी नुकसान, प्रतिद्वंद्वी से हार जाने अथवा निराशा के कारण भी यह रोग हो जाता है। जन्मजात उन्माद रोग का उपचार संभव नहीं है, परंतु युवावस्था के पश्चात् होने वाले रोग अथवा अल्पकालीन रोग के रोगी उपचार द्वारा ठीक हो जाते हैं।अनिद्रा, अपच, स्मृति-नाश, बुद्धि-भ्रम, स्वेच्छा से बिना किसी तारतम्य की बातें कहना, आंखों की भाव-भंगिमा में परिवर्तन हो जाना, मानसिक भावनाओं को अधिक प्रकट करना, इच्छाओं पर काबू न रह जाना, तेज बोलना या अचानक चुप हो जाना इत्यादि लक्षण इस रोग में दिखाई देते हैं। रोगी आत्महत्या के विचार से भी ग्रस्त हो सकता है।
उपचार—
ब्राह्मी बूटी को गाय के घी में भली भांति पकाएं। ब्राह्मी बूटी न मिलने पर किसी प्रसिद्ध आयुर्वेदिक संस्थान का ‘ब्राह्मीघृत’ खरीद लाएं और एक गिलास गाय के दूध में 10 ग्राम यह घी डालकर एक उबाल दें। फिर इसे हल्का सा फेंटकर गुनगुना रह जाने पर 25 ग्राम शहद घोलकर घूंट-घूंट सेवन करें। एक माह के नियमित प्रयोग से यह रोग दूर हो जाएगा।सर्पगंधा तथा जटामांसी का चूर्ण 4-4 ग्राम लेकर 2 ग्राम शक्कर मिलाकर सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन करें।भोजन में धारोष्ण दूध, ताजे घी, कच्चे नारियल आदि की अधिकता रखें। मानसिक उत्तेजना से रोगी को बचाएं। भरपूर नींद लेने दें। हल्के-फुल्के कार्यों में ही रोगी को लगाएं। स्वच्छ और उत्फुल्ल प्राकृतिक वातावरण में सुबह-शाम भ्रमण करना काफी लाभदायक होता है।
मस्तिष्क-भ्रम
अत्यधिक मानसिक परिश्रम, मानसिक उद्वेग, चिंता, भय, शोक, निराशा जैसे भावों की अधिकता, लगातार एक ही कार्य करते रहना, आंखों पर अधिक जोर डालना, अंधेरे और तेज रोशनी वाले परिवर्तनीय कार्य इत्यादि कारणों से यह रोग हो जाता है।किसी काम में मन न लगना, चंचल रहना, हृदय की धड़कन बढ़ना, अनिद्रा, किसी वस्तु के कारण या लक्षण का भ्रम हो जाना, उत्तेजना, शोर या तेज रोशनी सहन न होना, भोजन से अरुचि इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं।
उपचार—
प्रतिदिन ब्राह्मीघृत लेकर चाटें और ऊपर से गाय का दूध का सेवन करें।नित्य प्रातः 5 खजूर खाकर एक गिलास गुनगुना गाय का दूध पिएं।गाय के दूध की मलाई व ब्राह्मी बूटी का ½ चम्मच रस एक चम्मच शहद मिलाकर एक माह तक नियमित रूप से सेवन करने से मस्तिष्क भ्रम का रोग दूर हो जाता है।
अनिद्रा (नींद न आना)
यह रोग प्रायः मानसिक कारणों से होता है। मानसिक परेशानियां, चिंताएं, शोक, तनाव, डर, निराशा आदि के कारण, अत्यधिक थकान होने के कारण, दिन में सोने, शारीरिक परिश्रम की कमी, अधिक भोजन, ध्वनि—प्रदूषण, उत्तेजक पदार्थों के अधिक सेवन इत्यादि कारणों से भी अनिद्रा रोग हो जाता है।नींद न आना इस रोग का प्रमुख लक्षण है। बेचैनी, सिर में लगातार भारीपन, कभी-कभी सिर दर्द होना, आंखों में जलन होना, शरीर में स्फूर्ति का ह्रास इत्यादि लक्षण भी दिखाई देते हैं।
उपचार—
एक गिलास गाय/भैंस का दूध देर तक पकाकर गुनगुना रहने पर रात को सोने से पूर्व पीएं। कुछ ही दिनों के नियमित प्रयोग से अनिद्रा रोग दूर हो जाएगा।बकरी का दूध उबालकर उसमें चुटकी भर नमक डालें। इस दूध से हाथों में कुहनियों तक हथेलियों पर तथा पैरों की पिंडलियों एवं तलुओं पर हल्की-हल्की मालिश करें। मालिश करने के पश्चात् गुनगुने पानी से दूध की चिपचिपाहट धो डालें। उसे धोने के लिए ठंडे पानी का प्रयोग करें। रोग दूर हो जाएगा।रात्रि को सोने से पूर्व मानसिक आवेगों—चिंता, निराशा, शोक, आशंका, भय इत्यादि से बचने का प्रयास करें। साथ ही सूर्यास्त के बाद तंबाकू, कॉफी, मदिरा आदि पदार्थों का सेवन न करें। हाथ-मुंह-पैर धोकर ही सोने के लिए लेटें।
Friday, 12 June 2009
Tuesday, 2 June 2009
aam
आम
आम सर्वजन्य सुलभ और सुपाच्य भी है। यह इतना स्वादिष्ट, सुगन्धित और पौष्टिकतत्व युक्त होता है कि इसे ‘फलों का राजा’ कहा जाता है।
सामान्य परिचय
आम मोटे तौर पर दो प्रकार का होता है—1. जो आम बीज बो कर पैदा किया जाता है उसे देशी आम कहते हैं। यह रस वाला होता है। इसे चूस कर खाया जाता है या रस निकाल कर ‘आमरस’ के रूप में खाया जाता है।2. जो आप कलम लगाकर पैदा किया जाता है उसे ‘कलमी आम’ कहते हैं। इन दो भेदों के अलावा आकार, रंग, स्वाद और गुण इत्यादि के भेद से आम की और भी अनेक जातियां होती हैं जैसे—हाफुज, सफेदा, लंगड़ा, पैरी, नीलम, तोतापरी, राजभोग, मोहनभोग, फजली, दशहरी आदि। देशी आम रेशेवाला होने से रसदार होता है जबकि कलमी आम रेशे वाला नहीं होता अतः काट कर खाया जाता है। पचने की दृष्टि से रसवाला आम अच्छा होता है और चूस कर खाये जाने पर जल्दी पचता है।
गुण
पका हुआ आम मीठा, वीर्यवर्द्धक, स्निग्ध, बलवर्द्धक, सुखदायक, भारी, वातनाशक, हृदय को बल देने वाला, वर्ण (रंग) को अच्छा करने वाला, शीतल और पित्त को न बढ़ाने वाला, कसैले रस वाला तथा अग्नि, कफ तथा वीर्य बढ़ाने वाला है।आम के गुण, स्थिति के अनुसार अलग-अलग होते हैं। पेड़ पर पका आम भारी, वात का शमन करने वाला मीठा तथा अम्ल व तनिक पित्त शामक होता है। पाल से पकाया हुआ आम पित्तनाशक, अम्ल रस रहित और विशेष रूप से मीठा होता है लेकिन पाल से उतरा हुआ हो तो खराब स्वाद और दुर्गन्ध वाला होता है अतः ऐसा आम सेवन नहीं करना चाहिए।कच्चे आम को कैरी या आमिया कहते हैं। कच्चा आम स्वाद में कसैला, तीनों दोषों को कुपित करने वाला तथा रक्तविकार उत्पन्न करने वाला होता है। कच्चे आम का छिलका उतारकर गूदे के टुकड़े कर धूप में सुखा लेते हैं जिसे आमचूर कहते हैं। यह दाल, शाक में डाला जाता है। यह खट्टा, कसैला, दस्तावर, धातुओं को दूषित करने वाला तथा वात व कफ को जीतने वाला होता है। आमचूर का अति सेवन नहीं करना चाहिए।आम एक ऐसा अद्भुत वृक्ष है जिसके सिर्फ फल ही नहीं बल्कि इसके सभी अंग-प्रत्यंग औषधि—रूप में प्रयोग किये जा सकते हैं। अन्य अंगों के गुण इस प्रकार हैं—
आम का मौर—
शीतल, रुचिकारी, ग्राही, वातकारक और अतिसार, कफ, पित्त, प्रमेह और रक्तप्रदर को नष्ट करने वाला होता है।
आम की जड़—
कसैली, मलरोधक, शीतल, रुचिकर तथा कफ वात का शमन करती है।
आम के पत्ते—
आम के कोमल पत्ते कसैले, मलरोधक और त्रिदोष का शमन करते हैं।
आम की गुठली—
मीठी, तूरी और कुछ कसैली होती है। वमन, अतिसार और हृदय प्रदेश की पीड़ा दूर करती है।
आम की छाल—
संकोचक, रक्तस्त्राव बन्द करने वाली, बवासीर, वमन और अतिसार नष्ट करती है।
उपयोग
आम को खाने के अलावा चिकित्सा में भी उपयोग किया जाता है।
आम का रस एवं दूध
आम का सर्वश्रेष्ठ और अत्यन्त गुणकारी उपयोग इसका रस और दूध का एक साथ सेवन करना है। पके आम के रस में विटामिन ‘ए’ और विटामिन ‘सी’ भारी मात्रा में मौजूद रहते हैं। नेत्र ज्योति तथा शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने के लिए ‘विटामिन-ए’ और चर्म रोग रक्त विकार नष्ट करने के अलावा, बाल, दांत, व रक्त के लिए ‘विटामिन-सी’ अच्छा काम करते हैं। आम के रस में पर्याप्त मात्रा में दूध मिला दिया जाए तो इसके गुणों में भारी वृद्धि हो जाती है और यह रक्तवर्द्धक टॉनिक का काम करता है। कमजोर, दुबले-पतले शरीर वाले लड़के-लड़कियां एवं रक्ताल्पता, क्षय, रक्तविकार, धातु-दौर्बल्य और वार्यक्षय के रोगियों के लिए आम के रस व दूध का सेवन अत्यन्त गुणकारी होता है। इस मिश्रण में मृदु विरेचक गुण होता है अतः कब्ज के रोगियों के लिए यह बहुत उपयोगी होता है। अम्लपित्त (हायपरएसिडिटी), आंतों की कमजोरी, संग्रहणी, अरुचि, यकृत-वृद्धि, यौनशक्ति की कमी आदि व्याधियों को दूर करने के लिए आम का रस और दूध का सेवन करना उत्तम है।यदि भोजन करना बन्द करके कम से कम 40 दिन तक केवल आम का रस और दूध का सेवन किया जाए तो बहुत लाभ होता है। इसके दो तरीके हैं। एक तो पेट भर कर आम चूस कर ऊपर से उबाल कर ठण्डा किया हुआ मीठा दूध पीना चाहिए या आम का रस निकाल कर उसमें आधी मात्रा में दूध मिला कर थोड़ा सा सौंठ चूर्ण और 1-2 चम्मच शुद्ध घी मिला कर सुबह और शाम पीना चाहिए पहले दूध पीकर बाद में आम का रस पीया जा सकता है। यदि एक दो माह तक यह प्रयोग कर लिया जाए तो शरीर में नया जोश, भारी बल और रक्त की वृद्धि होती है तथा चेहरा कांतिमय हो जाता है। गर्भवती स्त्रियों के लिए आम का रस और दूध का सेवन फायदेमंद होता है। यौनशक्ति में कमी का अनुभव करने वालों के लिए यह प्रयोग बेजोड़ है।आम के वृक्ष की छाल लगभग 30-40 ग्राम वजन में लेकर मोटा-मोटा कूट लें और पाव भर पानी में डालकर शाम को रख दें। ऊपर से ढक दें। सुबह इसे खूब मसल कर छान लें और पी जाएं। सुजाक के रोगी को आम मिलता रहे तब तक यह नुस्खा प्रयोग करें। आम की गुठली की गिरी पीसकर, सूंघने से नकसीर में लाभ मिलता है।आम के पत्तों को पानी में डाल कर उबालें। जब पानी एक चौथाई शेष बचे तब उतार कर ठण्डा कर लें और 1-2 चम्मच शहद डाल कर गरारे करने व पी जाने से गला ठीक हो जाता है।स्त्रियों के रक्तप्रदर और खूनी बवासीर के रोगियों के रक्तस्त्राव को रोकने के लिए, उन्हें आम की गुठली की गिरी का महीन चूर्ण 2-3 ग्राम की मात्रा में, जल के सात सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। इसके कोमल पत्तों को पानी के साथ घोंट पीस कर छान कर, थोड़ी शक्कर मिलाकर पाने से भी लाभ होता है।कच्ची कैरी को गर्म राख में दबा कर भून कर, इसका रस निकाल कर मिश्री मिलाकर पीने से लू का असर मिटता है।आमचूर को पानी में पीसकर त्वचा पर लेप करने से मकड़ी के विष का असर खत्म होता है। आम की गुठली की गिरी पानी में पीस कर जले हुए अंग पर लेप करने से तुरन्त ठण्डक मिलती है। इनमें से किसी भी नुस्खे का सेवन, सम्बन्धित रोग के ठीक न होने तक करना चाहिए।आम का अधिक सेवन हानिकारक होता है। इससे अपच, रक्त विकार, ज्वर, कब्ज आदि रोग उत्पन्न होते हैं। आम को उचित एवं अनुकूल मात्रा में ही दूध के साथ सेवन करना चाहिए। खट्टा आम नहीं खाना चाहिए। आम खाने पर यदि अपच की स्थिति बने तो आधा चम्मच सोंठ चूर्ण, ठण्डे पानी के साथ लें या एक गिलास दूध में सोंठ चूर्ण डाल कर थोड़ी देर उबालें और पी लें। इसके सेवन से आम खाने से हुआ अपच ठीक हो जाएगा।
आम से रोगोपचार
• आम में अनेक पौष्टिक तत्त्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ आम में ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। आम की एक जाति कजरी होती है। उसमें सेब से 3 गुना और संतरे से 30 गुणा विटामिन ‘ए’ और ‘जी’ पाया जाता है। यह जीवन तत्त्व मात्र आम के गूदे में ही नहीं, बल्कि आम के छिलके में भी पाया जाता है। स्वास्थ्य एवं सौंदर्य की दृष्टि से आम का प्रयोग अत्यधिक आवश्यक है।• उपलों में भुनी हुई या पानी में औटाई हुई कच्ची कैरी को पानी में मसल कर उसके रस को छान लें। उसमें शक्कर, भुना हुआ जीरा, काली मिर्च, पिसा हुआ पुदीना एवं नमक सबको मिला कर स्वास्थ्यवर्द्धक एवं स्वादिष्ट शर्बत बनाया जा सकता है। इसका प्रयोग करने से लू, धूप का प्रभाव मिट जाता है। भुनी हुई कच्ची कैरी के रस का शरीर पर मर्दन करने से उष्णता का असर नहीं होता है।• आम की कच्ची कैरी को चीर कर छोटी-छोटी फाड़ों में सुखाया जाता है। सूखने के बाद उसे आमचूर कहते हैं। इसे पानी में पीसकर लगाने से जहरीले जानवरों का जहर उतर जाता है।• आम का शर्बत कच्ची कैरी से बनता है। यह शर्बत दिल और जिगर के लिए फायदेमंद होता है। यह हैजे के रोगी के लिए अति उपयोगी है। हैजे के रोगी दो-दो घंटे बाद 25 मि.ली. शर्बत में 125 मि.ली. पानी मिला कर थोड़ा-थोड़ा पिलाएं, इससे रोग की प्रारंभिक स्थिति में शीघ्र लाभ होता है।• आम का मुरब्बा कच्ची कैरी से बनता है। यह पौष्टिक, धातु विकृति नाशक एवं क्षुधावर्द्धक होता है। इसे खाकर पानी नहीं पीना चाहिए। दूध पीया जा सकता है लेकिन दूध पीकर इसे खाना नहीं चाहिए। यह एक महारसायन है। यह आधि-व्याधि नाशक, बल, वीर्यवर्द्धक, नवयौवन एवं नई स्फूर्ति प्रदायक है। यह दिमाग और दिल को एक दिव्य शक्ति प्रदान करता है। कंठ में तेज और वाणी में ओज भरता है।• कच्ची कैरी की तीन प्रकार से चटनी बनाई जाती है। यह खाने में स्वादिष्ट, क्षुदा, अग्नि एवं बुद्धिवर्द्धक होती है, लेकिन अम्लपित्त के रोगी के लिए यह सर्वदा वर्जनीय है। • आम का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए रामबाण औषधि है। यह कोष्ठबद्धता को दूर कर शौच साफ लाता है।• आम को यदि शहद के साथ सेवन किया जाता है तो क्षय एवं प्लीहा से पिंड छूट जाता है। • आम को घृत के साथ खाने से शक्ति में वृद्धि होती है।• आम का मीठा अचार रक्त पित्त को दूर करने में सहायक होता है।• आम्रपाक शक्कर एवं सुगंधित द्रव्यों के योग से आम रस के साथ बनाया जाता है। इसमें अतिश्रम की अपेक्षा रहती है। वीर्य, बल, बुद्धि एवं आयुवर्द्धक होता है। क्षय, संग्रहणी, सांस आदि की व्याधियों में अति उपयोगी होता है।• आम्रासव पके आम के रस से निर्मित होता है। नवजीवन प्राप्ति के लिए अत्युत्तम है। मात्र 50 ग्राम से 100 ग्राम, भोजन से पूर्व दोनों समय इसका सेवन करना चाहिए।• आम परिवार का प्रत्येक सदस्य औषधीय गुणों से भरा है, निर्दोष है। आम की जड़ मलावरोधक, वात-कफ नाशक होती है। आम के वृक्ष की टहनी दातुन के काम आती है। इससे मुख की दुर्गन्ध दूर होती है। आम वृक्ष का तना रक्तस्त्राव को बन्द करता है। आम वृक्ष का बौर मलावरोधक, अग्नि दीपक, पित्त, कफ नाशक माना जाता है। इसका क्वाथ एवं चूर्ण अतिसार में उपयोगी है। मच्छरों के प्रतिकारार्थ इसकी धूनी दी जाती है। आम की कोंपल पानी में पीस-छान कर उसमें थोड़ी सी शक्कर मिलाकर पीने से बवासीर का खून बन्द हो जाता है। 25 ग्राम कोमल कोंपल का रस निकालकर उसमें 25 ग्राम मिश्री मिलाकर प्रयोग करने से रक्तप्रदर में अतिशीघ्र लाभ होता है। आम का पत्ता मलावरोधक, त्रिदोषनाशक, वमनप्रद एवं रक्तातिसार में लाभप्रद है। पत्तों के रस को गरम कर कानों में डालने से कर्णशूल में फायदा होता है।• आम की गोंद स्तंभक एवं रक्त प्रसादक है। इस गोंद को गरम करके फोड़ों पर लगाने से पीब पककर बह जाती है और आसानी से भर जाता है। आम की गोंद को नीबू के रस में मिलाकर चर्म रोग पर लेप किया जाता है।• आम की छाल के दो प्रकार—ऊपर की, अंदर की होती है। ऊपरी छाल तिक्त रस युक्त, कसैली, सुगंधित, रुचिकर, दाहनाशक, मलावरोधक होती है। यह अपने कषाय रस युक्त गुणों के द्वारा शरीर के अन्दर के स्त्रोतों को संकुचित कर स्त्रावों को रोक देती है। प्रसवकालीन रक्तस्त्राव में इसका उपयोग अशोक छाल के समान होता है। इसी छाल के साथ जामुन-बेर, बबूल और आंवला वृक्षों की भी छालों को मिलाकर क्वाथ तैयार कर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर सेवन करने से अतिशीघ्र ही रक्तस्त्राव बन्द हो जाता है। ऊपरी छाल को दही के साथ पीस कर नाभि एवं उसके आस-पास गाढ़ा लेप करने से अतिसार में विशेष लाभ होता है।• आम के फूल शीतल, रक्त-शोधक, कफ, पित्त, प्रमेह और अतिसार नाशक। फूलों का क्वाथ एवं चूर्ण, इनके चतुर्थ भाग मिश्री मिलाकर प्रातः सायं शीतल जल के साथ सेवन करने से अतिसार प्रमेह, रक्तदोष, दाह एवं पित्त के कष्ट दूर हो जाते हैं। फूलों के रस में शक्कर मिलाकर सेवन करने से भी सारे रोग दूर भाग जाते हैं।• आम्र फल को दो प्रकार से काम में लिया जाता है—कच्चे और पक्के। कच्ची कैरी गुठली रहित एवं गुठली सहित दोनों को नहीं खाना चाहिए क्योंकि ये अधिक खट्टी, वातपित्तवर्द्धक, रक्तविकृतिकारक होती है। यदि इनको खाना हो तो शक्कर, धनिया, जीरा एवं सैंधा नमक के साथ खाएं अन्यथा स्वरभंग दंतहर्ष आदि व्याधियों का शिकार बनना पड़ता है।• आम की गुठली को पत्थर पर घिस कर लेप करने से विष दूर हो जाता है। आम की गुठली की गिरी, बेलगिरी और मिश्री तीनों का समभाग चूर्ण बना कर उसे पांच ग्राम की मात्रा में जल के साथ ग्रहण करें। इससे अतिसार में लाभ होता है। भुनी हुई गुठली की गिरी का चूर्ण बना कर उचित मात्रा में शहद के साथ बच्चों को सेवन कराएं। इससे अतिसार हवा के साथ उड़ जाता है। आम की गुठली की गिरी को बारीक पीसकर सूंघने से नकसीर बन्द हो जाती है।• आम की गुठली की गिरी को पानी में भिगो कर एवं पीस कर आग से जले स्थान पर लेप करने से जलन शान्त हो जाती है। आम की गुठली की गिरी का दो ग्राम चूर्ण प्रतिदिन सेवन करने से बवासीर, रक्तप्रदर और रक्तातिसार का खून बन्द हो जाता है। • आम की गुठली घिस कर पागल कुत्ते, बिच्छू एवं सामान्य सांप के द्वारा काटे हुए स्थान पर लगाने से विष उतर जाता है।
आम सर्वजन्य सुलभ और सुपाच्य भी है। यह इतना स्वादिष्ट, सुगन्धित और पौष्टिकतत्व युक्त होता है कि इसे ‘फलों का राजा’ कहा जाता है।
सामान्य परिचय
आम मोटे तौर पर दो प्रकार का होता है—1. जो आम बीज बो कर पैदा किया जाता है उसे देशी आम कहते हैं। यह रस वाला होता है। इसे चूस कर खाया जाता है या रस निकाल कर ‘आमरस’ के रूप में खाया जाता है।2. जो आप कलम लगाकर पैदा किया जाता है उसे ‘कलमी आम’ कहते हैं। इन दो भेदों के अलावा आकार, रंग, स्वाद और गुण इत्यादि के भेद से आम की और भी अनेक जातियां होती हैं जैसे—हाफुज, सफेदा, लंगड़ा, पैरी, नीलम, तोतापरी, राजभोग, मोहनभोग, फजली, दशहरी आदि। देशी आम रेशेवाला होने से रसदार होता है जबकि कलमी आम रेशे वाला नहीं होता अतः काट कर खाया जाता है। पचने की दृष्टि से रसवाला आम अच्छा होता है और चूस कर खाये जाने पर जल्दी पचता है।
गुण
पका हुआ आम मीठा, वीर्यवर्द्धक, स्निग्ध, बलवर्द्धक, सुखदायक, भारी, वातनाशक, हृदय को बल देने वाला, वर्ण (रंग) को अच्छा करने वाला, शीतल और पित्त को न बढ़ाने वाला, कसैले रस वाला तथा अग्नि, कफ तथा वीर्य बढ़ाने वाला है।आम के गुण, स्थिति के अनुसार अलग-अलग होते हैं। पेड़ पर पका आम भारी, वात का शमन करने वाला मीठा तथा अम्ल व तनिक पित्त शामक होता है। पाल से पकाया हुआ आम पित्तनाशक, अम्ल रस रहित और विशेष रूप से मीठा होता है लेकिन पाल से उतरा हुआ हो तो खराब स्वाद और दुर्गन्ध वाला होता है अतः ऐसा आम सेवन नहीं करना चाहिए।कच्चे आम को कैरी या आमिया कहते हैं। कच्चा आम स्वाद में कसैला, तीनों दोषों को कुपित करने वाला तथा रक्तविकार उत्पन्न करने वाला होता है। कच्चे आम का छिलका उतारकर गूदे के टुकड़े कर धूप में सुखा लेते हैं जिसे आमचूर कहते हैं। यह दाल, शाक में डाला जाता है। यह खट्टा, कसैला, दस्तावर, धातुओं को दूषित करने वाला तथा वात व कफ को जीतने वाला होता है। आमचूर का अति सेवन नहीं करना चाहिए।आम एक ऐसा अद्भुत वृक्ष है जिसके सिर्फ फल ही नहीं बल्कि इसके सभी अंग-प्रत्यंग औषधि—रूप में प्रयोग किये जा सकते हैं। अन्य अंगों के गुण इस प्रकार हैं—
आम का मौर—
शीतल, रुचिकारी, ग्राही, वातकारक और अतिसार, कफ, पित्त, प्रमेह और रक्तप्रदर को नष्ट करने वाला होता है।
आम की जड़—
कसैली, मलरोधक, शीतल, रुचिकर तथा कफ वात का शमन करती है।
आम के पत्ते—
आम के कोमल पत्ते कसैले, मलरोधक और त्रिदोष का शमन करते हैं।
आम की गुठली—
मीठी, तूरी और कुछ कसैली होती है। वमन, अतिसार और हृदय प्रदेश की पीड़ा दूर करती है।
आम की छाल—
संकोचक, रक्तस्त्राव बन्द करने वाली, बवासीर, वमन और अतिसार नष्ट करती है।
उपयोग
आम को खाने के अलावा चिकित्सा में भी उपयोग किया जाता है।
आम का रस एवं दूध
आम का सर्वश्रेष्ठ और अत्यन्त गुणकारी उपयोग इसका रस और दूध का एक साथ सेवन करना है। पके आम के रस में विटामिन ‘ए’ और विटामिन ‘सी’ भारी मात्रा में मौजूद रहते हैं। नेत्र ज्योति तथा शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने के लिए ‘विटामिन-ए’ और चर्म रोग रक्त विकार नष्ट करने के अलावा, बाल, दांत, व रक्त के लिए ‘विटामिन-सी’ अच्छा काम करते हैं। आम के रस में पर्याप्त मात्रा में दूध मिला दिया जाए तो इसके गुणों में भारी वृद्धि हो जाती है और यह रक्तवर्द्धक टॉनिक का काम करता है। कमजोर, दुबले-पतले शरीर वाले लड़के-लड़कियां एवं रक्ताल्पता, क्षय, रक्तविकार, धातु-दौर्बल्य और वार्यक्षय के रोगियों के लिए आम के रस व दूध का सेवन अत्यन्त गुणकारी होता है। इस मिश्रण में मृदु विरेचक गुण होता है अतः कब्ज के रोगियों के लिए यह बहुत उपयोगी होता है। अम्लपित्त (हायपरएसिडिटी), आंतों की कमजोरी, संग्रहणी, अरुचि, यकृत-वृद्धि, यौनशक्ति की कमी आदि व्याधियों को दूर करने के लिए आम का रस और दूध का सेवन करना उत्तम है।यदि भोजन करना बन्द करके कम से कम 40 दिन तक केवल आम का रस और दूध का सेवन किया जाए तो बहुत लाभ होता है। इसके दो तरीके हैं। एक तो पेट भर कर आम चूस कर ऊपर से उबाल कर ठण्डा किया हुआ मीठा दूध पीना चाहिए या आम का रस निकाल कर उसमें आधी मात्रा में दूध मिला कर थोड़ा सा सौंठ चूर्ण और 1-2 चम्मच शुद्ध घी मिला कर सुबह और शाम पीना चाहिए पहले दूध पीकर बाद में आम का रस पीया जा सकता है। यदि एक दो माह तक यह प्रयोग कर लिया जाए तो शरीर में नया जोश, भारी बल और रक्त की वृद्धि होती है तथा चेहरा कांतिमय हो जाता है। गर्भवती स्त्रियों के लिए आम का रस और दूध का सेवन फायदेमंद होता है। यौनशक्ति में कमी का अनुभव करने वालों के लिए यह प्रयोग बेजोड़ है।आम के वृक्ष की छाल लगभग 30-40 ग्राम वजन में लेकर मोटा-मोटा कूट लें और पाव भर पानी में डालकर शाम को रख दें। ऊपर से ढक दें। सुबह इसे खूब मसल कर छान लें और पी जाएं। सुजाक के रोगी को आम मिलता रहे तब तक यह नुस्खा प्रयोग करें। आम की गुठली की गिरी पीसकर, सूंघने से नकसीर में लाभ मिलता है।आम के पत्तों को पानी में डाल कर उबालें। जब पानी एक चौथाई शेष बचे तब उतार कर ठण्डा कर लें और 1-2 चम्मच शहद डाल कर गरारे करने व पी जाने से गला ठीक हो जाता है।स्त्रियों के रक्तप्रदर और खूनी बवासीर के रोगियों के रक्तस्त्राव को रोकने के लिए, उन्हें आम की गुठली की गिरी का महीन चूर्ण 2-3 ग्राम की मात्रा में, जल के सात सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। इसके कोमल पत्तों को पानी के साथ घोंट पीस कर छान कर, थोड़ी शक्कर मिलाकर पाने से भी लाभ होता है।कच्ची कैरी को गर्म राख में दबा कर भून कर, इसका रस निकाल कर मिश्री मिलाकर पीने से लू का असर मिटता है।आमचूर को पानी में पीसकर त्वचा पर लेप करने से मकड़ी के विष का असर खत्म होता है। आम की गुठली की गिरी पानी में पीस कर जले हुए अंग पर लेप करने से तुरन्त ठण्डक मिलती है। इनमें से किसी भी नुस्खे का सेवन, सम्बन्धित रोग के ठीक न होने तक करना चाहिए।आम का अधिक सेवन हानिकारक होता है। इससे अपच, रक्त विकार, ज्वर, कब्ज आदि रोग उत्पन्न होते हैं। आम को उचित एवं अनुकूल मात्रा में ही दूध के साथ सेवन करना चाहिए। खट्टा आम नहीं खाना चाहिए। आम खाने पर यदि अपच की स्थिति बने तो आधा चम्मच सोंठ चूर्ण, ठण्डे पानी के साथ लें या एक गिलास दूध में सोंठ चूर्ण डाल कर थोड़ी देर उबालें और पी लें। इसके सेवन से आम खाने से हुआ अपच ठीक हो जाएगा।
आम से रोगोपचार
• आम में अनेक पौष्टिक तत्त्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ आम में ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। आम की एक जाति कजरी होती है। उसमें सेब से 3 गुना और संतरे से 30 गुणा विटामिन ‘ए’ और ‘जी’ पाया जाता है। यह जीवन तत्त्व मात्र आम के गूदे में ही नहीं, बल्कि आम के छिलके में भी पाया जाता है। स्वास्थ्य एवं सौंदर्य की दृष्टि से आम का प्रयोग अत्यधिक आवश्यक है।• उपलों में भुनी हुई या पानी में औटाई हुई कच्ची कैरी को पानी में मसल कर उसके रस को छान लें। उसमें शक्कर, भुना हुआ जीरा, काली मिर्च, पिसा हुआ पुदीना एवं नमक सबको मिला कर स्वास्थ्यवर्द्धक एवं स्वादिष्ट शर्बत बनाया जा सकता है। इसका प्रयोग करने से लू, धूप का प्रभाव मिट जाता है। भुनी हुई कच्ची कैरी के रस का शरीर पर मर्दन करने से उष्णता का असर नहीं होता है।• आम की कच्ची कैरी को चीर कर छोटी-छोटी फाड़ों में सुखाया जाता है। सूखने के बाद उसे आमचूर कहते हैं। इसे पानी में पीसकर लगाने से जहरीले जानवरों का जहर उतर जाता है।• आम का शर्बत कच्ची कैरी से बनता है। यह शर्बत दिल और जिगर के लिए फायदेमंद होता है। यह हैजे के रोगी के लिए अति उपयोगी है। हैजे के रोगी दो-दो घंटे बाद 25 मि.ली. शर्बत में 125 मि.ली. पानी मिला कर थोड़ा-थोड़ा पिलाएं, इससे रोग की प्रारंभिक स्थिति में शीघ्र लाभ होता है।• आम का मुरब्बा कच्ची कैरी से बनता है। यह पौष्टिक, धातु विकृति नाशक एवं क्षुधावर्द्धक होता है। इसे खाकर पानी नहीं पीना चाहिए। दूध पीया जा सकता है लेकिन दूध पीकर इसे खाना नहीं चाहिए। यह एक महारसायन है। यह आधि-व्याधि नाशक, बल, वीर्यवर्द्धक, नवयौवन एवं नई स्फूर्ति प्रदायक है। यह दिमाग और दिल को एक दिव्य शक्ति प्रदान करता है। कंठ में तेज और वाणी में ओज भरता है।• कच्ची कैरी की तीन प्रकार से चटनी बनाई जाती है। यह खाने में स्वादिष्ट, क्षुदा, अग्नि एवं बुद्धिवर्द्धक होती है, लेकिन अम्लपित्त के रोगी के लिए यह सर्वदा वर्जनीय है। • आम का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए रामबाण औषधि है। यह कोष्ठबद्धता को दूर कर शौच साफ लाता है।• आम को यदि शहद के साथ सेवन किया जाता है तो क्षय एवं प्लीहा से पिंड छूट जाता है। • आम को घृत के साथ खाने से शक्ति में वृद्धि होती है।• आम का मीठा अचार रक्त पित्त को दूर करने में सहायक होता है।• आम्रपाक शक्कर एवं सुगंधित द्रव्यों के योग से आम रस के साथ बनाया जाता है। इसमें अतिश्रम की अपेक्षा रहती है। वीर्य, बल, बुद्धि एवं आयुवर्द्धक होता है। क्षय, संग्रहणी, सांस आदि की व्याधियों में अति उपयोगी होता है।• आम्रासव पके आम के रस से निर्मित होता है। नवजीवन प्राप्ति के लिए अत्युत्तम है। मात्र 50 ग्राम से 100 ग्राम, भोजन से पूर्व दोनों समय इसका सेवन करना चाहिए।• आम परिवार का प्रत्येक सदस्य औषधीय गुणों से भरा है, निर्दोष है। आम की जड़ मलावरोधक, वात-कफ नाशक होती है। आम के वृक्ष की टहनी दातुन के काम आती है। इससे मुख की दुर्गन्ध दूर होती है। आम वृक्ष का तना रक्तस्त्राव को बन्द करता है। आम वृक्ष का बौर मलावरोधक, अग्नि दीपक, पित्त, कफ नाशक माना जाता है। इसका क्वाथ एवं चूर्ण अतिसार में उपयोगी है। मच्छरों के प्रतिकारार्थ इसकी धूनी दी जाती है। आम की कोंपल पानी में पीस-छान कर उसमें थोड़ी सी शक्कर मिलाकर पीने से बवासीर का खून बन्द हो जाता है। 25 ग्राम कोमल कोंपल का रस निकालकर उसमें 25 ग्राम मिश्री मिलाकर प्रयोग करने से रक्तप्रदर में अतिशीघ्र लाभ होता है। आम का पत्ता मलावरोधक, त्रिदोषनाशक, वमनप्रद एवं रक्तातिसार में लाभप्रद है। पत्तों के रस को गरम कर कानों में डालने से कर्णशूल में फायदा होता है।• आम की गोंद स्तंभक एवं रक्त प्रसादक है। इस गोंद को गरम करके फोड़ों पर लगाने से पीब पककर बह जाती है और आसानी से भर जाता है। आम की गोंद को नीबू के रस में मिलाकर चर्म रोग पर लेप किया जाता है।• आम की छाल के दो प्रकार—ऊपर की, अंदर की होती है। ऊपरी छाल तिक्त रस युक्त, कसैली, सुगंधित, रुचिकर, दाहनाशक, मलावरोधक होती है। यह अपने कषाय रस युक्त गुणों के द्वारा शरीर के अन्दर के स्त्रोतों को संकुचित कर स्त्रावों को रोक देती है। प्रसवकालीन रक्तस्त्राव में इसका उपयोग अशोक छाल के समान होता है। इसी छाल के साथ जामुन-बेर, बबूल और आंवला वृक्षों की भी छालों को मिलाकर क्वाथ तैयार कर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर सेवन करने से अतिशीघ्र ही रक्तस्त्राव बन्द हो जाता है। ऊपरी छाल को दही के साथ पीस कर नाभि एवं उसके आस-पास गाढ़ा लेप करने से अतिसार में विशेष लाभ होता है।• आम के फूल शीतल, रक्त-शोधक, कफ, पित्त, प्रमेह और अतिसार नाशक। फूलों का क्वाथ एवं चूर्ण, इनके चतुर्थ भाग मिश्री मिलाकर प्रातः सायं शीतल जल के साथ सेवन करने से अतिसार प्रमेह, रक्तदोष, दाह एवं पित्त के कष्ट दूर हो जाते हैं। फूलों के रस में शक्कर मिलाकर सेवन करने से भी सारे रोग दूर भाग जाते हैं।• आम्र फल को दो प्रकार से काम में लिया जाता है—कच्चे और पक्के। कच्ची कैरी गुठली रहित एवं गुठली सहित दोनों को नहीं खाना चाहिए क्योंकि ये अधिक खट्टी, वातपित्तवर्द्धक, रक्तविकृतिकारक होती है। यदि इनको खाना हो तो शक्कर, धनिया, जीरा एवं सैंधा नमक के साथ खाएं अन्यथा स्वरभंग दंतहर्ष आदि व्याधियों का शिकार बनना पड़ता है।• आम की गुठली को पत्थर पर घिस कर लेप करने से विष दूर हो जाता है। आम की गुठली की गिरी, बेलगिरी और मिश्री तीनों का समभाग चूर्ण बना कर उसे पांच ग्राम की मात्रा में जल के साथ ग्रहण करें। इससे अतिसार में लाभ होता है। भुनी हुई गुठली की गिरी का चूर्ण बना कर उचित मात्रा में शहद के साथ बच्चों को सेवन कराएं। इससे अतिसार हवा के साथ उड़ जाता है। आम की गुठली की गिरी को बारीक पीसकर सूंघने से नकसीर बन्द हो जाती है।• आम की गुठली की गिरी को पानी में भिगो कर एवं पीस कर आग से जले स्थान पर लेप करने से जलन शान्त हो जाती है। आम की गुठली की गिरी का दो ग्राम चूर्ण प्रतिदिन सेवन करने से बवासीर, रक्तप्रदर और रक्तातिसार का खून बन्द हो जाता है। • आम की गुठली घिस कर पागल कुत्ते, बिच्छू एवं सामान्य सांप के द्वारा काटे हुए स्थान पर लगाने से विष उतर जाता है।
Saturday, 30 May 2009
Subscribe to:
Comments (Atom)

